लंकाकांंड चौपाई(788-797) एवं छंद

 लंकाकाड चौपाई(788-797) एवं छंद का। भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

मज्जहि भूत पिसाच बेताला। प्रमथ महा झोटिंग कराला।।

काक कंक लै भुजा उड़ाहीं। एक ते छीनि एक लै खाहीं।।

एक कहहिं ऐसिउ सौंघाई। सठहु तुम्हार दरिद्र न जाई।।

कहँरत भट घायल तट गिरे। जहँ तहँ मनहुँ अर्धजल परे।।

खैंचहिं गीध आँत तट भए। जनु बंसी खेलत चित दए।।

बहु भट बहहिं चढ़े खग जाहीं। जनु नावरि खेलहिं सरि माहीं।।

जोगिनि भरि भरि खप्पर संचहिं। भूत पिसाच बधू नभ नंचहिं।।

भट कपाल करताल बजावहिं। चामुंडा नाना बिधि गावहिं।।

जंबुक निकर कटक्कट कट्टहिं। खाहिं हुआहिं अघाहिं दपट्टहिं।।

कोटिन्ह रुंड मुंड बिनु डोल्लहिं। सीस परे महि जय जय बोल्लहिं।।

छं0-बोल्लहिं जो जय जय मुंड रुंड प्रचंड सिर बिनु धावहीं।

खप्परिन्ह खग्ग अलुज्झि जुज्झहिं सुभट भटन्ह ढहावहीं।।

बानर निसाचर निकर मर्दहिं राम बल दर्पित भए।

संग्राम अंगन सुभट सोवहिं राम सर निकरन्हि हए।।

भावार्थ :

युद्धभूमि में मरे हुए सैनिकों के शरीर पर भूत, पिशाच और बेताल टूट पड़े हैं। वे उनकी भुजाएँ खा रहे हैं और आपस में छीनाझपटी कर रहे हैं। घायल सैनिक इधर-उधर गिरे पड़े हैं, जैसे आधे पानी में डूबे हों।

गिद्ध (गीध) उनकी आँतों को खींच रहे हैं, जैसे कोई मछली पकड़ने का खेल हो। बहुत से योद्धा नदी में नाव की तरह बहते दिख रहे हैं। योगिनियाँ खोपड़ियों में खून भर रही हैं और भूत-पिशाचों की स्त्रियाँ आकाश में नाच रही हैं।

चामुंडा देवी कपालों से ताल देकर गा रही हैं, सियारों के झुंड हड्डियाँ चबा रहे हैं। बिना सिर के धड़ भी “जय-जय” बोलते हुए दौड़ रहे हैं।

छंद में बताया गया है कि ये मुंड (सिर) और रुंड (धड़) भी युद्ध कर रहे हैं। वानर और राक्षस सेना एक-दूसरे को मार रही है, और अंत में श्रीराम के बाणों से सभी वीर युद्धभूमि में सो जाते हैं (अर्थात मर जाते हैं)।

🔹 विस्तृत विवेचन

भयानक युद्ध का चित्रण

गोस्वामी तुलसीदास ने यहाँ युद्ध की भीषणता को बहुत जीवंत रूप में दिखाया है। यह दृश्य बताता है कि युद्ध कितना विनाशकारी होता है।

अलौकिक तत्वों का प्रयोग

भूत, पिशाच, योगिनी आदि का वर्णन करके वातावरण को और भी डरावना और रहस्यमय बनाया गया है।

राम की शक्ति का प्रभाव

अंत में यह दिखाया गया है कि श्रीराम के बाणों के सामने सभी वीर निष्प्राण हो जाते हैं—यह उनकी दिव्य शक्ति को दर्शाता है।

प्रकृति का विकराल रूप

गिद्ध, सियार, खून, कपाल—ये सब मिलकर युद्धभूमि को नरक जैसा बना देते हैं।

🔹 निष्कर्ष

यह चौपाई और छंद युद्ध की भीषणता, भयावहता और विनाश का सजीव चित्रण है, साथ ही यह भी बताता है कि अंततः धर्म (राम) की ही विजय होती है।

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