लंकाकांड दोहा (79)
लंकाकांड दोहा (79) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दो0-दुहु दिसि जय जयकार करि निज निज जोरी जानि।
भिरे बीर इत रामहि उत रावनहि बखानि।।79।।
भावार्थ
दोनों ओर की सेनाएँ (राम और रावण पक्ष) अपने-अपने बल और सामर्थ्य को पहचानकर “जय-जय” का नाद करती हुई युद्ध में भिड़ गईं। एक ओर के वीर श्रीराम का गुणगान कर रहे थे, जबकि दूसरी ओर के योद्धा रावण की प्रशंसा करते हुए युद्ध कर रहे थे।
🔍 विस्तृत विवेचन
इस दोहे में युद्ध के आरंभ का अत्यंत जीवंत चित्रण मिलता है। जब राम और रावण की सेनाएँ आमने-सामने आती हैं, तब दोनों पक्षों में अपार उत्साह और जोश दिखाई देता है। हर योद्धा अपनी शक्ति और क्षमता को भली-भाँति जानता है और उसी आत्मविश्वास के साथ युद्ध में प्रवेश करता है।
“निज-निज जोरी जानि” का अर्थ है कि प्रत्येक योद्धा अपनी सामर्थ्य को पहचानकर ही युद्ध करता है। यह केवल शारीरिक बल ही नहीं, बल्कि मानसिक दृढ़ता और आत्मविश्वास का भी प्रतीक है।
दोनों ओर से “जय-जयकार” का नाद यह दर्शाता है कि हर पक्ष अपने नेता को सर्वोत्तम मानता है—
वानर सेना श्रीराम को धर्म और सत्य का प्रतीक मानकर उनकी जय-जयकार कर रही थी।
राक्षस सेना रावण को अपना स्वामी मानकर उसका गुणगान कर रही थी।
यह दृश्य केवल एक साधारण युद्ध नहीं, बल्कि धर्म और अधर्म का महान संघर्ष है। एक ओर मर्यादा, सत्य और धर्म के प्रतीक श्रीराम हैं, और दूसरी ओर अहंकार तथा अधर्म का प्रतीक रावण।
🌟 मुख्य संदेश
हर व्यक्ति अपने पक्ष को सही मानकर पूरे आत्मविश्वास से कार्य करता है।
अंततः विजय हमेशा धर्म, सत्य और मर्यादा की ही होती है।
🪔 निष्कर्ष
यह दोहा हमें सिखाता है कि जीवन में संघर्ष के समय आत्मविश्वास और अपनी शक्ति का ज्ञान अत्यंत आवश्यक है। परंतु अंतिम विजय उसी की होती है जो सत्य और धर्म के मार्ग पर चलता है।
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