लंकाकांड चौपाई(798-805)एवं छंद
लंकाकांड चौपाई (798-805) एवं छंद का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
इहाँ बिभीषन सब सुधि पाई। सपदि जाइ रघुपतिहि सुनाई।।
नाथ करइ रावन एक जागा। सिद्ध भएँ नहिं मरिहि अभागा।।
पठवहु नाथ बेगि भट बंदर। करहिं बिधंस आव दसकंधर।।
प्रात होत प्रभु सुभट पठाए। हनुमदादि अंगद सब धाए।।
कौतुक कूदि चढ़े कपि लंका। पैठे रावन भवन असंका।।
जग्य करत जबहीं सो देखा। सकल कपिन्ह भा क्रोध बिसेषा।।
रन ते निलज भाजि गृह आवा। इहाँ आइ बक ध्यान लगावा।।
अस कहि अंगद मारा लाता। चितव न सठ स्वारथ मन राता।।
छं0-नहिं चितव जब करि कोप कपि गहि दसन लातन्ह मारहीं।
धरि केस नारि निकारि बाहेर तेऽतिदीन पुकारहीं।।
तब उठेउ क्रुद्ध कृतांत सम गहि चरन बानर डारई।
एहि बीच कपिन्ह बिधंस कृत मख देखि मन महुँ हारई।।
भावार्थ :
चौपाई:
विभीषण को पूरी खबर मिलती है कि रावण एक विशेष यज्ञ कर रहा है।
वह तुरंत जाकर श्रीराम को बताता है कि अगर यह यज्ञ पूरा हो गया, तो रावण को मारना मुश्किल हो जाएगा।
इसलिए वह सलाह देता है कि तुरंत वानर-सेना भेजकर यज्ञ को नष्ट कर दिया जाए।
प्रभु श्रीराम सुबह होते ही हनुमान, अंगद आदि वीरों को भेजते हैं।
वानर सेना कूदकर लंका में पहुँचती है और बिना डर के रावण के महल में घुस जाती है।
वहाँ वे देखते हैं कि रावण यज्ञ कर रहा है, तो सबको बहुत क्रोध आता है।
जो रावण युद्ध से भागकर आया था, वही अब ध्यान लगाकर बैठा है (कपियों को यह ढोंग लगता है)।
तब अंगद उसे लात मारते हैं, लेकिन रावण स्वार्थ में डूबा होने के कारण ध्यान नहीं देता।
🔶 छंद का भावार्थ
जब रावण ध्यान नहीं देता, तो क्रोधित वानर उसे दाँत और लात से मारने लगते हैं।
वे उसकी स्त्रियों के बाल पकड़कर उन्हें बाहर निकालते हैं, वे बहुत दीन होकर रोती हैं।
तब रावण क्रोध से उठता है (मानो काल ही हो) और वानरों को पकड़कर पटक देता है।
इसी बीच वानरों ने यज्ञ को पूरी तरह नष्ट कर दिया, जिससे रावण मन ही मन हार मान जाता है।
🔶 विस्तृत विवेचन
विभीषण की नीति और भक्ति
विभीषण सच्चे भक्त और बुद्धिमान हैं। वे तुरंत समझ जाते हैं कि यह यज्ञ खतरनाक है और श्रीराम को सूचना देकर धर्म का साथ देते हैं।
रावण का स्वार्थ और अहंकार
रावण युद्ध छोड़कर यज्ञ करने बैठ जाता है—यह उसका भय और चालाकी दोनों दिखाता है। वह धर्म का सहारा लेकर अधर्म करना चाहता है।
वानरों का उत्साह और वीरता
हनुमान, अंगद आदि बिना डर के लंका में घुस जाते हैं। उनका उद्देश्य स्पष्ट है—रावण के अधर्म को रोकना।
यज्ञ का विनाश = अधर्म की हार
यज्ञ केवल बाहरी कर्म था, लेकिन रावण का मन शुद्ध नहीं था। इसलिए वह सफल नहीं हुआ।
नैतिक संदेश
केवल पूजा या यज्ञ करने से फल नहीं मिलता, मन शुद्ध होना चाहिए।
अधर्म के लिए किया गया कोई भी शुभ कार्य सफल नहीं होता।
🔶 निष्कर्ष (बहुत short)
👉 रावण का यज्ञ असफल हुआ क्योंकि उसका उद्देश्य गलत था।
👉 विभीषण की नीति और वानरों की वीरता से धर्म की जीत सुनिश्चित हुई।
Comments
Post a Comment