लंकाकांड चौपाई (806-815) एवं छंद
लंकाकांड चौपाई (806-815) एवं छंद का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
चलत होहिं अति असुभ भयंकर। बैठहिं गीध उड़ाइ सिरन्ह पर।।
भयउ कालबस काहु न माना। कहेसि बजावहु जुद्ध निसाना।।
चली तमीचर अनी अपारा। बहु गज रथ पदाति असवारा।।
प्रभु सन्मुख धाए खल कैंसें। सलभ समूह अनल कहँ जैंसें।।
इहाँ देवतन्ह अस्तुति कीन्ही। दारुन बिपति हमहि एहिं दीन्ही।।
अब जनि राम खेलावहु एही। अतिसय दुखित होति बैदेही।।
देव बचन सुनि प्रभु मुसकाना। उठि रघुबीर सुधारे बाना।
जटा जूट दृढ़ बाँधै माथे। सोहहिं सुमन बीच बिच गाथे।।
अरुन नयन बारिद तनु स्यामा। अखिल लोक लोचनाभिरामा।।
कटितट परिकर कस्यो निषंगा। कर कोदंड कठिन सारंगा।।
छं0-सारंग कर सुंदर निषंग सिलीमुखाकर कटि कस्यो।
भुजदंड पीन मनोहरायत उर धरासुर पद लस्यो।।
कह दास तुलसी जबहिं प्रभु सर चाप कर फेरन लगे।
ब्रह्मांड दिग्गज कमठ अहि महि सिंधु भूधर डगमगे।।
भावार्थ:
युद्ध से पहले बहुत अशुभ संकेत दिखाई देने लगे—गिद्ध सिरों पर बैठने लगे, डरावनी घटनाएँ होने लगीं। फिर भी राक्षस (रावण की सेना) काल के वश होकर किसी की बात नहीं मानी और युद्ध के लिए नगाड़े बजा दिए।
राक्षसों की विशाल सेना हाथी, रथ, घोड़े और पैदल सैनिकों के साथ युद्ध के लिए चल पड़ी। वे भगवान राम की ओर ऐसे दौड़े जैसे पतंगे आग में कूदते हैं।
इधर देवताओं ने भगवान राम से प्रार्थना की कि हमें इस भयंकर संकट से बचाइए, सीता जी बहुत दुखी हैं। देवताओं की बात सुनकर भगवान राम मुस्कुराए और युद्ध के लिए तैयार हो गए।
उन्होंने अपनी जटाएँ बाँधीं, शरीर पर पुष्पों की शोभा थी, उनके नेत्र लाल और शरीर श्याम (मेघ के समान) था। वे अत्यंत सुंदर और आकर्षक लग रहे थे। कमर में तरकश बाँधकर हाथ में कोदंड धनुष लेकर खड़े हो गए।
जब भगवान राम ने धनुष-बाण उठाया, तब ऐसा लगा मानो पूरा ब्रह्मांड हिलने लगा—पर्वत, समुद्र, पृथ्वी सब कांप उठे।
🔹 विस्तृत विवेचन
अशुभ संकेत और काल का प्रभाव
यहाँ गिद्ध, भयावह घटनाएँ यह दर्शाती हैं कि राक्षसों का विनाश निश्चित है। “कालबस” शब्द बताता है कि जब विनाश निकट होता है, तब बुद्धि काम नहीं करती।
राक्षसों की मूर्खता (उपमा)
“सलभ समूह अनल कहँ जैंसें” उपमा बताती है कि जैसे पतंगे आग में जलने के लिए खुद जाते हैं, वैसे ही राक्षस राम से युद्ध करने दौड़े—यह उनकी मूर्खता और विनाश का संकेत है।
देवताओं की प्रार्थना
देवता भगवान से सहायता माँगते हैं—यह दर्शाता है कि राम केवल मानव नहीं, बल्कि ईश्वर रूप हैं।
राम का दिव्य रूप
जटा, श्याम शरीर, लाल नेत्र, धनुष-बाण—ये सब उनके वीर और दिव्य स्वरूप को प्रकट करते हैं। उनका रूप सौंदर्य और शक्ति दोनों का संगम है।
ब्रह्मांड का कांपना (अतिशयोक्ति अलंकार)
जब राम धनुष उठाते हैं, तो पूरा ब्रह्मांड हिलता है—यह उनकी शक्ति का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन है, जिससे उनकी महिमा और प्रभाव प्रकट होता है।
🔹 मुख्य भाव (2 points)
अहंकार और अधर्म का अंत निश्चित है
भगवान राम की दिव्य शक्ति और संरक्षण
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