लंकाकांड चौपाई (816-825) एवं छंद

 लंकाकांड चौपाई (816-825) एवं छंद का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

एहीं बीच निसाचर अनी। कसमसात आई अति घनी।

देखि चले सन्मुख कपि भट्टा। प्रलयकाल के जनु घन घट्टा।।

बहु कृपान तरवारि चमंकहिं। जनु दहँ दिसि दामिनीं दमंकहिं।।

गज रथ तुरग चिकार कठोरा। गर्जहिं मनहुँ बलाहक घोरा।।

कपि लंगूर बिपुल नभ छाए। मनहुँ इंद्रधनु उए सुहाए।।

उठइ धूरि मानहुँ जलधारा। बान बुंद भै बृष्टि अपारा।।

दुहुँ दिसि पर्बत करहिं प्रहारा। बज्रपात जनु बारहिं बारा।।

रघुपति कोपि बान झरि लाई। घायल भै निसिचर समुदाई।।

लागत बान बीर चिक्करहीं। घुर्मि घुर्मि जहँ तहँ महि परहीं।।

स्त्रवहिं सैल जनु निर्झर भारी। सोनित सरि कादर भयकारी।।

छं0-कादर भयंकर रुधिर सरिता चली परम अपावनी।

दोउ कूल दल रथ रेत चक्र अबर्त बहति भयावनी।।

जल जंतुगज पदचर तुरग खर बिबिध बाहन को गने।

सर सक्ति तोमर सर्प चाप तरंग चर्म कमठ घने।।

भावार्थ (सरल भाषा में)

राक्षसों की विशाल सेना तेजी से आती है। उसे देखकर वानर-भालू सेना भी युद्ध के लिए आगे बढ़ती है। दोनों सेनाएँ ऐसी लगती हैं जैसे प्रलयकाल के घने बादल टकरा रहे हों।

राक्षसों के हाथों में तलवारें चमक रही हैं, मानो आकाश में बिजली चमक रही हो। हाथी, घोड़े और रथों की आवाजें बादलों की गर्जना जैसी प्रतीत होती हैं।

वानर सेना आकाश में फैल जाती है, जैसे सुंदर इंद्रधनुष छा गया हो। युद्ध के कारण धूल उड़ती है, जो जलधारा जैसी लगती है, और बाणों की वर्षा हो रही है।

दोनों ओर से पर्वतों की तरह प्रहार हो रहे हैं, जैसे बार-बार वज्रपात हो रहा हो।

तब श्रीराम क्रोधित होकर बाणों की वर्षा करते हैं, जिससे राक्षस सेना घायल होकर गिरने लगती है।

घायल योद्धा चिल्लाते हुए गिरते हैं, और रक्त की नदियाँ बहने लगती हैं, जो भयानक दृश्य उत्पन्न करती हैं।

🔹 दोहे/छंद का भावार्थ

रक्त की भयानक नदी बह रही है, जिसके दोनों किनारों पर टूटे हुए रथ और सेना के अवशेष हैं।

उस नदी में हाथी, घोड़े, विभिन्न वाहन और सैनिक बह रहे हैं।

बाण, शक्ति, भाले आदि उस नदी की लहरों जैसे हैं, और ढालें कछुए (कमठ) की तरह प्रतीत होती हैं। पूरा दृश्य अत्यंत भयावह और वीभत्स है।

🔹 विस्तृत विवेचन

युद्ध का भीषण रूप

तुलसीदास जी ने युद्ध को प्रलयकाल जैसा बताया है। बादल, बिजली, वज्रपात आदि उपमाओं से युद्ध की भयावहता दिखती है।

अलंकारों का प्रयोग

उपमा अलंकार: “दामिनी दमंकहिं”, “बलाहक घोरा”

रूपक अलंकार: रक्त की नदी, बाणों की वर्षा

इससे वर्णन और प्रभावशाली बनता है।

प्रकृति के माध्यम से चित्रण

युद्ध को प्राकृतिक घटनाओं (बादल, बिजली, वर्षा) से जोड़कर उसे जीवंत और विशाल रूप दिया गया है।

वीर रस और भयानक रस

वीर रस: वानर और राम की वीरता

भयानक रस: रक्त, मृत्यु और विनाश का दृश्य

राम की शक्ति

अंत में श्रीराम के बाणों से राक्षस सेना का विनाश दिखाकर उनके पराक्रम को दर्शाया गया है।

🔹 निष्कर्ष

यह प्रसंग युद्ध की भयावहता, श्रीराम की वीरता और तुलसीदास जी की अद्भुत काव्य-शक्ति को दर्शाता है।

पूरे वर्णन में युद्ध को प्रलय जैसा दिखाकर पाठक के मन में गहरा प्रभाव उत्पन्न किया गया है।

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