लंकाकांड चौपाई (826-835) एवं छंद
लंकाकांड चौपाई (826-835) एवं छंद का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
मज्जहि भूत पिसाच बेताला। प्रमथ महा झोटिंग कराला।।
काक कंक लै भुजा उड़ाहीं। एक ते छीनि एक लै खाहीं।।
एक कहहिं ऐसिउ सौंघाई। सठहु तुम्हार दरिद्र न जाई।।
कहँरत भट घायल तट गिरे। जहँ तहँ मनहुँ अर्धजल परे।।
खैंचहिं गीध आँत तट भए। जनु बंसी खेलत चित दए।।
बहु भट बहहिं चढ़े खग जाहीं। जनु नावरि खेलहिं सरि माहीं।।
जोगिनि भरि भरि खप्पर संचहिं। भूत पिसाच बधू नभ नंचहिं।।
भट कपाल करताल बजावहिं। चामुंडा नाना बिधि गावहिं।।
जंबुक निकर कटक्कट कट्टहिं। खाहिं हुआहिं अघाहिं दपट्टहिं।।
कोटिन्ह रुंड मुंड बिनु डोल्लहिं। सीस परे महि जय जय बोल्लहिं।।
छं0-बोल्लहिं जो जय जय मुंड रुंड प्रचंड सिर बिनु धावहीं।
खप्परिन्ह खग्ग अलुज्झि जुज्झहिं सुभट भटन्ह ढहावहीं।।
बानर निसाचर निकर मर्दहिं राम बल दर्पित भए।
संग्राम अंगन सुभट सोवहिं राम सर निकरन्हि हए।।
भावार्थ:
युद्धभूमि में बहुत ही डरावना दृश्य है—
भूत, पिशाच और बेताल मरे हुए सैनिकों के शरीरों में मग्न हैं। कौए और गिद्ध सैनिकों की भुजाएँ खींचकर खा रहे हैं। घायल योद्धा ज़मीन पर ऐसे पड़े हैं जैसे पानी में आधे डूबे हों। गिद्ध उनकी आँतें खींच रहे हैं, जैसे कोई मछली पकड़ रहा हो।
योगिनियाँ खप्परों में रक्त भर रही हैं, भूत-पिशाच नाच रहे हैं, चामुंडा हँस-गाकर आनंद ले रही हैं। सियार मांस खाकर तृप्त हो रहे हैं। बिना सिर के धड़ (रुंड) और सिर (मुंड) अलग-अलग पड़े भी “जय-जय” बोलते प्रतीत हो रहे हैं।
अंत में बताया गया है कि वानर सेना श्रीराम के बल से गर्वित होकर राक्षसों को कुचल रही है, और श्रीराम के बाणों से अनेक योद्धा युद्धभूमि में गिरकर सो गए (मृत हो गए)।
🔹 विस्तृत विवेचन
तुलसीदास जी ने यहाँ युद्ध की भयानकता (रौद्र रस) का अत्यंत सजीव चित्र खींचा है।
भयावह वातावरण:
भूत, पिशाच, बेताल आदि का वर्णन यह दिखाता है कि युद्धभूमि अब मृत्यु का स्थान बन चुकी है।
प्रकृति की क्रूरता:
गिद्ध, कौए, सियार जैसे जीव मृत शरीरों को खा रहे हैं—यह युद्ध के बाद की सच्चाई को दर्शाता है।
अलौकिक दृश्य:
बिना सिर के धड़ “जय-जय” बोलते दिखाए गए हैं—यह अतिशयोक्ति अलंकार है, जिससे युद्ध की तीव्रता और विचित्रता बढ़ती है।
चामुंडा और योगिनियाँ:
यह संकेत देता है कि यह युद्ध सिर्फ भौतिक नहीं, बल्कि दैवी और आसुरी शक्तियों के बीच भी है।
राम की विजय का संकेत:
अंत में स्पष्ट होता है कि श्रीराम के बाणों से राक्षसों का संहार हो रहा है और वानर सेना विजयी हो रही है।
🔹 निष्कर्ष
यह चौपाई और छंद युद्ध की भयानकता, मृत्यु का तांडव और अंततः धर्म की विजय को दर्शाते हैं।
तुलसीदास जी ने रौद्र और वीभत्स रस का अद्भुत मिश्रण प्रस्तुत किया है, जिससे पाठक युद्ध की भयावहता को अनुभव कर सके।
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