लंकाकांड दोहा(83)
लंकाकांड दोहा(83) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दो0-देखि पवनसुत धायउ बोलत बचन कठोर।
आवत कपिहि हन्यो तेहिं मुष्टि प्रहार प्रघोर।।83।।
भावार्थ :
जब पवनपुत्र हनुमान जी को आते देखा, तो रावण क्रोध में कठोर वचन बोलता हुआ उनकी ओर दौड़ा और आते ही उसने हनुमान जी को जोरदार मुक्का मारा।
🔹 विस्तृत विवेचन
यह प्रसंग रामचरितमानस के लंका कांड का है।
यहाँ रावण का अहंकार और क्रोध दिखाया गया है—
जैसे ही उसने हनुमान जी को देखा, वह बिना सोचे-समझे आक्रमण कर देता है।
दूसरी तरफ, हनुमान जी की वीरता और धैर्य सामने आता है—
वे बिना डर के युद्ध स्वीकार करते हैं।
👉 इस दोहे में तुलसीदास जी यह दिखाते हैं कि
अधर्मी (रावण) हमेशा क्रोध और अहंकार में अंधा होता है
जबकि धर्म पक्ष (हनुमान जी) शांत लेकिन शक्तिशाली होता है
🔹 मुख्य संदेश (2 points)
क्रोध और अहंकार विनाश का कारण बनते हैं।
सच्चा वीर बिना डरे धर्म के लिए लड़ता है।
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