लंकाकांड दोहा(84)
लंकाकांड दोहा(84) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दो0-उहाँ दसानन जागि करि करै लाग कछु जग्य।
राम बिरोध बिजय चह सठ हठ बस अति अग्य।।84।।
भावार्थ :
रावण (दसानन) जागकर किसी यज्ञ को करने लगा। वह मूर्ख और हठी होकर भगवान राम का विरोध करके विजय पाना चाहता था, इसलिए अज्ञानवश यह उपाय कर रहा था।
🔹 विस्तृत विवेचन
इस दोहे में रावण के अहंकार और अज्ञान को दिखाया गया है।
रावण का यज्ञ करना:
युद्ध में हार की स्थिति देखकर रावण एक विशेष यज्ञ करने लगता है, जिससे उसे शक्ति और विजय मिल सके। लेकिन यह यज्ञ धर्म के लिए नहीं, बल्कि स्वार्थ और अहंकार के लिए था।
अहंकार और हठ:
रावण जानता था कि सामने भगवान राम हैं, फिर भी वह अपने हठ (जिद) और घमंड के कारण सत्य को स्वीकार नहीं करता।
अज्ञान (अग्य):
वह यह नहीं समझ पाया कि भगवान के विरोध में कोई भी साधना या यज्ञ सफल नहीं हो सकता। इसलिए उसका प्रयास व्यर्थ था।
🔹 मुख्य संदेश
अहंकार और हठ व्यक्ति को विनाश की ओर ले जाते हैं।
भगवान के विरोध में किया गया कोई भी कार्य सफल नहीं होता।
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