लंकाकाड दोहा(85)

 लंकाकांड दोहा(85) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दो0-जग्य बिधंसि कुसल कपि आए रघुपति पास।

चलेउ निसाचर क्रुर्द्ध होइ त्यागि जिवन कै आस।।85।।

भावार्थ :

वानरों (हनुमान आदि) ने रावण का यज्ञ नष्ट कर दिया और सुरक्षित वापस श्रीराम के पास आ गए।

उधर राक्षस (रावण) बहुत क्रोधित होकर, जीवन की आशा छोड़कर युद्ध के लिए निकल पड़ा।

🔍 विस्तृत विवेचन:

इस दोहे में युद्ध की निर्णायक स्थिति दिखाई गई है।

यज्ञ विध्वंस का अर्थ:

रावण ने विजय पाने के लिए यज्ञ किया था। मान्यता थी कि यज्ञ पूरा हो जाता तो वह अजेय हो जाता।

लेकिन वानरों ने उसे समय रहते नष्ट कर दिया, जिससे उसकी रक्षा शक्ति खत्म हो गई।

कपियों की सफलता:

हनुमान, अंगद आदि ने यह कार्य बुद्धि और वीरता से किया और बिना हानि के राम के पास लौट आए।

यह दिखाता है कि धर्म और नीति की जीत होती है।

रावण का क्रोध और हताशा:

यज्ञ नष्ट होते ही रावण समझ गया कि अब उसकी मृत्यु निश्चित है।

इसलिए वह क्रोध में, जीवन की आशा छोड़कर अंतिम युद्ध के लिए निकल पड़ा।

⚡ मुख्य संदेश (2 points only):

अधर्म (रावण) का सहारा (यज्ञ) नष्ट होते ही उसका पतन निश्चित हो जाता है।

धर्म (राम पक्ष) में बुद्धि + बल होने से विजय निश्चित होती है।

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