लंकाकांड दोहा (87)
लंकाकांड दोहा (87) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दो0-बीर परहिं जनु तीर तरु मज्जा बहु बह फेन।
कादर देखि डरहिं तहँ सुभटन्ह के मन चेन।।87।।
भावार्थ :
युद्ध में वीर योद्धा ऐसे गिर रहे हैं जैसे तीर से कटे हुए पेड़ गिरते हैं। उनके शरीर की मज्जा (अंदर का भाग) और रक्त बह रहा है, जिससे फेन (झाग) जैसा दिख रहा है। यह भयानक दृश्य देखकर कायर लोग डर जाते हैं, लेकिन सच्चे वीरों के मन में बिल्कुल भी डर नहीं होता।
विस्तृत विवेचन:
इस दोहे में युद्ध का बहुत ही भयानक और यथार्थ चित्रण किया गया है। कवि बताते हैं कि युद्धभूमि में वीर योद्धा तेजी से गिर रहे हैं, मानो तीर से काटे गए पेड़ धराशायी हो रहे हों। उनके शरीर से बहता रक्त और मज्जा झाग जैसा दृश्य उत्पन्न करता है, जो युद्ध की क्रूरता को दर्शाता है।
यह दृश्य इतना भयावह है कि जो कायर (कमजोर हृदय वाले) हैं, वे इसे देखकर डर जाते हैं और उनका मन विचलित हो जाता है। इसके विपरीत, जो सच्चे वीर (सुभट) हैं, वे इस भयानक स्थिति में भी अपने धैर्य और साहस को बनाए रखते हैं। उनके मन में कोई भय नहीं होता, बल्कि वे और अधिक उत्साह से युद्ध करते हैं।
मुख्य संदेश (2 points):
सच्चा वीर कठिन और डरावनी परिस्थिति में भी नहीं डरता।
कायर व्यक्ति छोटी-सी भयावह स्थिति में भी घबरा जाता है।
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