लंकाकांड चौपाई (854-861) एवं छंद
लंकाकांड चौपाई (854-861) एवं छंद का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
कहि दुर्बचन क्रुद्ध दसकंधर। कुलिस समान लाग छाँड़ै सर।।
नानाकार सिलीमुख धाए। दिसि अरु बिदिस गगन महि छाए।।
पावक सर छाँड़ेउ रघुबीरा। छन महुँ जरे निसाचर तीरा।।
छाड़िसि तीब्र सक्ति खिसिआई। बान संग प्रभु फेरि चलाई।।
कोटिक चक्र त्रिसूल पबारै। बिनु प्रयास प्रभु काटि निवारै।।
निफल होहिं रावन सर कैसें। खल के सकल मनोरथ जैसें।।
तब सत बान सारथी मारेसि। परेउ भूमि जय राम पुकारेसि।।
राम कृपा करि सूत उठावा। तब प्रभु परम क्रोध कहुँ पावा।।
छं0-भए क्रुद्ध जुद्ध बिरुद्ध रघुपति त्रोन सायक कसमसे।
कोदंड धुनि अति चंड सुनि मनुजाद सब मारुत ग्रसे।।
मँदोदरी उर कंप कंपति कमठ भू भूधर त्रसे।
चिक्करहिं दिग्गज दसन गहि महि देखि कौतुक सुर हँसे।।
यह प्रसंग रामचरितमानस के लंका कांड से लिया गया है। इसमें भगवान श्रीराम और रावण के भीषण युद्ध का वर्णन है।
भावार्थ
रावण क्रोधित होकर कठोर वचन बोलता है और वज्र के समान तीखे बाण छोड़ता है। अनेक प्रकार के बाण चारों दिशाओं और आकाश में छा जाते हैं। तब वीर श्रीराम अग्निबाण चलाते हैं, जिससे राक्षसों के सारे बाण क्षणभर में जलकर नष्ट हो जाते हैं।
इसके बाद क्रोध में आकर रावण अत्यंत तीव्र शक्ति (शक्ति अस्त्र) छोड़ता है, परंतु श्रीराम उसे भी अपने बाण से वापस लौटा देते हैं। रावण करोड़ों चक्र और त्रिशूल फेंकता है, किंतु प्रभु श्रीराम बिना किसी कठिनाई के उन्हें काटकर नष्ट कर देते हैं। रावण के बाण वैसे ही निष्फल हो जाते हैं जैसे दुष्ट मनुष्य की सभी बुरी इच्छाएँ निष्फल हो जाती हैं।
तब रावण सौ बाणों से श्रीराम के सारथी को घायल कर देता है। सारथी भूमि पर गिरते हुए “जय श्रीराम” पुकारता है। श्रीराम कृपा करके उसे पुनः उठा देते हैं। यह देखकर प्रभु को अत्यंत क्रोध आता है।
छंद का भावार्थ
जब श्रीराम युद्ध में अत्यंत क्रोधित हुए, तब उनके तरकश के बाण मानो बेचैन होकर निकलने लगे। उनके धनुष कोदंड की भयंकर टंकार सुनकर देवता और मनुष्य भयभीत हो गए।
रावण की पत्नी मंदोदरी का हृदय काँप उठा। कच्छप, पृथ्वी और पर्वत तक भय से थर्रा उठे। दिग्गज हाथी दाँतों से पृथ्वी को पकड़कर चिंघाड़ने लगे। इस अद्भुत युद्ध को देखकर देवता आश्चर्यचकित होकर हँसने लगे।
विस्तृत विवेचन
इस प्रसंग में तुलसीदास जी ने श्रीराम और रावण के युद्ध की विराटता तथा अद्भुतता का चित्रण किया है। रावण अपनी समस्त शक्ति और अस्त्रों का प्रयोग करता है, परंतु धर्म और सत्य के प्रतीक श्रीराम के सामने उसकी सारी शक्तियाँ निष्फल हो जाती हैं।
“खल के सकल मनोरथ जैसें” उपमा अत्यंत सुंदर है। इसका अर्थ है कि जैसे दुष्ट व्यक्ति की बुरी इच्छाएँ कभी सफल नहीं होतीं, वैसे ही रावण के अस्त्र भी असफल हो रहे थे।
श्रीराम का अपने सारथी पर कृपा करना उनकी दयालुता और करुणा को दर्शाता है। वहीं उनके क्रोध का वर्णन यह बताता है कि जब धर्म पर आघात होता है, तब भगवान भी रौद्र रूप धारण करते हैं।
छंद में युद्ध का वातावरण अत्यंत प्रभावशाली बनाया गया है। धनुष की टंकार, पृथ्वी का काँपना, मंदोदरी का भयभीत होना तथा देवताओं का आश्चर्य — ये सब मिलकर युद्ध की भयंकरता को जीवंत बना देते हैं।
Comments
Post a Comment