लंकाकांड चौपाई (862-875)एवं छंद

 लंकाकांड चौपाई (862-875) एवं छंद का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

चले बान सपच्छ जनु उरगा। प्रथमहिं हतेउ सारथी तुरगा।।

रथ बिभंजि हति केतु पताका। गर्जा अति अंतर बल थाका।।

तुरत आन रथ चढ़ि खिसिआना। अस्त्र सस्त्र छाँड़ेसि बिधि नाना।।

बिफल होहिं सब उद्यम ताके। जिमि परद्रोह निरत मनसा के।।

तब रावन दस सूल चलावा। बाजि चारि महि मारि गिरावा।।

तुरग उठाइ कोपि रघुनायक। खैंचि सरासन छाँड़े सायक।।

रावन सिर सरोज बनचारी। चलि रघुबीर सिलीमुख धारी।।

दस दस बान भाल दस मारे। निसरि गए चले रुधिर पनारे।।

स्त्रवत रुधिर धायउ बलवाना। प्रभु पुनि कृत धनु सर संधाना।।

तीस तीर रघुबीर पबारे। भुजन्हि समेत सीस महि पारे।।

काटतहीं पुनि भए नबीने। राम बहोरि भुजा सिर छीने।।

प्रभु बहु बार बाहु सिर हए। कटत झटिति पुनि नूतन भए।।

पुनि पुनि प्रभु काटत भुज सीसा। अति कौतुकी कोसलाधीसा।।

रहे छाइ नभ सिर अरु बाहू। मानहुँ अमित केतु अरु राहू।।

छं0-जनु राहु केतु अनेक नभ पथ स्त्रवत सोनित धावहीं।

रघुबीर तीर प्रचंड लागहिं भूमि गिरन न पावहीं।।

एक एक सर सिर निकर छेदे नभ उड़त इमि सोहहीं।

जनु कोपि दिनकर कर निकर जहँ तहँ बिधुंतुद पोहहीं।।

यह प्रसंग रामचरितमानस के लंका कांड का है। इसमें भगवान श्रीराम और रावण के भीषण युद्ध का अत्यंत ओजपूर्ण वर्णन किया गया है।

भावार्थ

युद्धभूमि में श्रीराम के बाण पंखयुक्त सर्पों के समान वेग से चलने लगे। उन्होंने सबसे पहले रावण के सारथि और घोड़ों को मार डाला। फिर रथ, ध्वजा और पताका को नष्ट कर दिया। रावण भीतर से निर्बल और थका हुआ हो गया, परंतु क्रोध में गर्जना करता रहा।

रावण तुरंत दूसरा रथ लेकर चढ़ा और अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र चलाने लगा, किंतु उसके सारे प्रयत्न निष्फल हो गए। तुलसीदास जी कहते हैं कि जैसे परद्रोह में लगे मनुष्य के सभी कार्य अंततः व्यर्थ हो जाते हैं, वैसे ही रावण के अस्त्र भी विफल हो रहे थे।

तब रावण ने दस भयंकर त्रिशूल चलाए और श्रीराम के चारों घोड़ों को भूमि पर गिरा दिया। यह देखकर श्रीराम क्रोधित हुए। उन्होंने घोड़ों को उठाकर धनुष खींचा और तीव्र बाण छोड़े। वे बाण रावण के सिर रूपी कमलों में घूमने वाले भ्रमरों के समान प्रतीत हो रहे थे।

श्रीराम ने रावण के दसों सिरों और मस्तकों पर दस-दस बाण मारे। रक्त की धाराएँ बह निकलीं। फिर भी रावण अत्यंत बलवान होकर दौड़ा। तब श्रीराम ने तीस बाण चलाकर उसके सिर और भुजाओं को काटकर भूमि पर गिरा दिया।

परंतु आश्चर्य यह हुआ कि जैसे ही सिर और भुजाएँ कटतीं, तुरंत नए सिर और भुजाएँ उत्पन्न हो जातीं। श्रीराम बार-बार उन्हें काटते रहे। यह दृश्य अत्यंत अद्भुत था। आकाश में कटे हुए सिर और भुजाएँ ऐसे छा गए मानो असंख्य राहु और केतु मंडरा रहे हों।

छंद का भावार्थ

आकाश में उड़ते हुए रक्त बहाते रावण के सिर और भुजाएँ ऐसे दिखाई दे रहे थे मानो अनेक राहु-केतु घूम रहे हों। श्रीराम के प्रचंड बाण उन्हें लगातार काटते जाते थे और वे पृथ्वी पर गिरने भी नहीं पाते थे।

हर एक बाण सिरों के समूह को छेदता हुआ आकाश में उड़ता था। वह दृश्य ऐसा लगता था मानो क्रोधित सूर्य अपनी किरणों से आकाश में फैले राहु-केतुओं का नाश कर रहा हो।

विस्तृत विवेचन

1. युद्ध का वीर रस

इस प्रसंग में वीर रस अपनी चरम सीमा पर है। बाणों की गति, रथों का टूटना, सिरों का कटना और रक्त की धाराएँ — सब युद्ध की भीषणता को प्रकट करते हैं। तुलसीदास जी ने शब्दों द्वारा ऐसा चित्र खींचा है कि पाठक के सामने युद्धभूमि सजीव हो उठती है।

2. रावण के अहंकार का प्रतीक

रावण के सिर बार-बार कटकर पुनः उत्पन्न होना उसके अहंकार, वासना और अधर्म का प्रतीक है। केवल बाहरी शक्ति से उसका अंत संभव नहीं था; उसके अमृत रहस्य को जानना आवश्यक था। यह बताता है कि अहंकार बार-बार सिर उठाता है।

3. परद्रोह का परिणाम

“बिफल होहिं सब उद्यम ताके। जिमि परद्रोह निरत मनसा के।।” इस पंक्ति में तुलसीदास जी गहरा नीति-संदेश देते हैं। जो व्यक्ति दूसरों का अहित सोचता है, उसके सारे प्रयास अंततः विफल हो जाते हैं। रावण इसका जीवंत उदाहरण है।

4. श्रीराम की दिव्य लीला

भगवान श्रीराम बार-बार रावण के सिर काटते हैं, जबकि वे जानते हैं कि वे फिर उत्पन्न हो जाएंगे। यह उनकी लीला है। वे देवताओं और संसार को अपनी अद्भुत शक्ति का दर्शन करा रहे हैं।

5. अलंकार और काव्य-सौंदर्य

उपमा अलंकार — बाणों की तुलना सर्पों से, सिरों की तुलना राहु-केतु से।

रूपक अलंकार — रावण के सिरों को कमल और बाणों को भ्रमर कहा गया है।

दृश्य चित्रण — आकाश में उड़ते सिर और रक्तधाराओं का चित्र अत्यंत सजीव बन पड़ा है।

शिक्षा

यह प्रसंग सिखाता है कि—

अधर्म और अहंकार चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंत में उसका नाश निश्चित है।

दूसरों का अहित सोचने वाला व्यक्ति कभी सफल नहीं होता।

भगवान की शक्ति और धर्म की विजय सदैव होती है।

Comments

Popular posts from this blog

लंकाकांड चौपाई (376-383)

लंका काण्ड चौपाई (151-160)

लंकाकांड चौपाई (495--502)