लंकाकांड चौपाई (876-883) एवं छंद

 लंकाकांड चौपाई (876-883) एवं छंद का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दसमुख देखि सिरन्ह कै बाढ़ी। बिसरा मरन भई रिस गाढ़ी।।

गर्जेउ मूढ़ महा अभिमानी। धायउ दसहु सरासन तानी।।

समर भूमि दसकंधर कोप्यो। बरषि बान रघुपति रथ तोप्यो।।

दंड एक रथ देखि न परेऊ। जनु निहार महुँ दिनकर दुरेऊ।।

हाहाकार सुरन्ह जब कीन्हा। तब प्रभु कोपि कारमुक लीन्हा।।

सर निवारि रिपु के सिर काटे। ते दिसि बिदिस गगन महि पाटे।।

काटे सिर नभ मारग धावहिं। जय जय धुनि करि भय उपजावहिं।।

कहँ लछिमन सुग्रीव कपीसा। कहँ रघुबीर कोसलाधीसा।।

छं0-कहँ रामु कहि सिर निकर धाए देखि मर्कट भजि चले।

संधानि धनु रघुबंसमनि हँसि सरन्हि सिर बेधे भले।।

सिर मालिका कर कालिका गहि बृंद बृंदन्हि बहु मिलीं।

करि रुधिर सरि मज्जनु मनहुँ संग्राम बट पूजन चलीं।।

यह प्रसंग रामचरितमानस के लंकाकांड से लिया गया है। इसमें युद्धभूमि में रावण और श्रीराम के भयंकर युद्ध का अत्यंत वीर एवं अद्भुत वर्णन किया गया है।

भावार्थ

जब रावण ने देखा कि उसके कटे हुए सिर फिर बढ़ जाते हैं, तब उसका क्रोध और अधिक बढ़ गया। वह मृत्यु को भी भूल गया और अत्यंत अभिमान से गरजने लगा। उसने अपने दसों धनुष खींचकर श्रीराम पर तीव्र बाणों की वर्षा कर दी।

उसके बाणों से युद्धभूमि ढक गई और श्रीराम का रथ दिखाई नहीं पड़ता था, जैसे घने बादलों में सूर्य छिप जाता है। यह देखकर देवताओं में हाहाकार मच गया। तब श्रीराम ने क्रोधित होकर अपना धनुष उठाया और रावण के बाणों को काटते हुए उसके सिर काटने लगे।

कटे हुए सिर आकाश में चारों दिशाओं में उड़ने लगे और “जय-जय” की भयानक ध्वनि करते हुए भय उत्पन्न करने लगे। वे मानो पूछ रहे हों—“लक्ष्मण कहाँ हैं? सुग्रीव कहाँ हैं? और कोशलपति श्रीराम कहाँ हैं?”

छंद में वर्णन है कि कटे हुए सिरों के समूह आकाश में दौड़ रहे थे। यह देखकर वानर सेना भयभीत होकर भागने लगी। तब रघुवंशमणि श्रीराम मुस्कुराकर अपने बाणों से उन सिरों को भेदने लगे।

ऐसा प्रतीत होता था मानो काली अनेक योगिनियों के साथ उन सिरों की माला धारण कर रक्त की नदी में स्नान करते हुए युद्धरूपी वटवृक्ष की पूजा करने जा रही हों।

विस्तृत विवेचन

इस प्रसंग में कवि गोस्वामी तुलसीदास ने युद्ध का अत्यंत सजीव और अलौकिक चित्र प्रस्तुत किया है।

1. रावण का अहंकार

रावण के सिर कटने पर भी पुनः उत्पन्न हो जाते हैं। इससे उसका अभिमान और बढ़ जाता है। वह अपनी मृत्यु की संभावना को भूलकर और अधिक क्रोधित हो उठता है। यह अहंकार उसके विनाश का कारण बनता है।

2. युद्ध का भयानक दृश्य

रावण के बाणों से पूरा आकाश भर जाता है। श्रीराम का रथ दिखाई नहीं देता। तुलसीदास जी ने इसकी तुलना बादलों में छिपे सूर्य से की है। इससे युद्ध की तीव्रता और भयावहता प्रकट होती है।

3. श्रीराम की वीरता

देवताओं के भयभीत होने पर श्रीराम क्रोधित होकर अपने दिव्य बाण चलाते हैं और रावण के सिर काट देते हैं। यहाँ श्रीराम की वीरता, धैर्य और अद्भुत पराक्रम का वर्णन है।

4. अलौकिक एवं वीभत्स रस

कटे हुए सिरों का आकाश में उड़ना, “जय-जय” की ध्वनि करना तथा रक्त की नदी का वर्णन वीभत्स रस उत्पन्न करता है। वहीं देवी काली का सिरों की माला धारण करना युद्ध की तांत्रिक एवं अलौकिक छवि प्रस्तुत करता है।

5. प्रतीकात्मक अर्थ

रावण के बार-बार उगने वाले सिर मनुष्य के भीतर के काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसे विकारों के प्रतीक हैं। केवल बाहरी शक्ति से नहीं, बल्कि दिव्य ज्ञान और धर्म से ही उनका अंत संभव है। श्रीराम धर्म, सत्य और मर्यादा के प्रतीक हैं।

काव्य सौंदर्य

वीर रस और वीभत्स रस का सुंदर मिश्रण।

उपमा अलंकार — “जनु निहार महुँ दिनकर दुरेऊ”।

युद्ध का अत्यंत चित्रात्मक एवं गतिशील वर्णन।

देवी काली के माध्यम से तांत्रिक एवं रहस्यमयी वातावरण की रचना।

यह प्रसंग श्रीराम की दिव्य शक्ति तथा रावण के अहंकारपूर्ण विनाश का अत्यंत प्रभावशाली चित्र प्रस्तुत करता है।


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