लंकाकांड दोहा (88)
लंकाकांड दोहा (88) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दो0-रावन हृदयँ बिचारा भा निसिचर संघार।
मैं अकेल कपि भालु बहु माया करौं अपार।।88।।
भावार्थ :
रावण मन में सोचने लगा कि राक्षसों का नाश हो रहा है। इसलिए वह ठानता है कि मैं अकेला ही अपनी अपार माया से वानर-भालुओं को नष्ट कर दूँ।
✦ विस्तृत विवेचन
इस दोहे में युद्ध के समय रावण की मानसिक स्थिति दिखाई गई है। जब वह देखता है कि उसके राक्षस सेना (निशाचर) लगातार मारे जा रहे हैं, तब उसके मन में चिंता उत्पन्न होती है।
लेकिन यह चिंता उसे सही रास्ते पर नहीं लाती, बल्कि उसका अहंकार (ego) और बढ़ जाता है। वह सोचता है कि अब मैं अकेला ही अपनी माया (जादुई शक्ति) से सभी वानर-भालुओं को खत्म कर दूँगा।
यहाँ दो मुख्य बातें दिखती हैं:
अहंकार और अज्ञान – रावण सच्चाई नहीं समझता कि श्रीराम की शक्ति के सामने उसकी माया कुछ भी नहीं।
विनाश की शुरुआत – जब व्यक्ति केवल अपने बल पर घमंड करता है, तो उसका पतन निश्चित हो जाता है।
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