लंकाकांड चौपाई (884-891) एवं छंद
लंकाकांड चौपाई (884-891) एवं छंद का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
आवत देखि सक्ति अति घोरा। प्रनतारति भंजन पन मोरा।।
तुरत बिभीषन पाछें मेला। सन्मुख राम सहेउ सोइ सेला।।
लागि सक्ति मुरुछा कछु भई। प्रभु कृत खेल सुरन्ह बिकलई।।
देखि बिभीषन प्रभु श्रम पायो। गहि कर गदा क्रुद्ध होइ धायो।।
रे कुभाग्य सठ मंद कुबुद्धे। तैं सुर नर मुनि नाग बिरुद्धे।।
सादर सिव कहुँ सीस चढ़ाए। एक एक के कोटिन्ह पाए।।
तेहि कारन खल अब लगि बाँच्यो। अब तव कालु सीस पर नाच्यो।।
राम बिमुख सठ चहसि संपदा। अस कहि हनेसि माझ उर गदा।।
छं0-उर माझ गदा प्रहार घोर कठोर लागत महि पर् यो।
दस बदन सोनित स्त्रवत पुनि संभारि धायो रिस भर् यो।।
द्वौ भिरे अतिबल मल्लजुद्ध बिरुद्ध एकु एकहि हनै।
रघुबीर बल दर्पित बिभीषनु घालि नहिं ता कहुँ गनै।।
भावार्थ
जब भगवान श्रीराम ने रावण द्वारा छोड़ी गई अत्यंत भयंकर शक्ति (अस्त्र) को अपनी ओर आते देखा, तब उन्होंने सोचा कि “शरणागत की पीड़ा हरना मेरा प्रण है।” इसलिए उन्होंने तुरंत विभीषण को अपने पीछे कर लिया और स्वयं सामने होकर उस शक्ति को सह लिया।
उस शक्ति के लगने से श्रीराम कुछ समय के लिए मूर्छित हो गए। यह सब भगवान की लीला थी, परंतु देवता अत्यंत व्याकुल हो उठे।
जब विभीषण ने देखा कि प्रभु को कष्ट हुआ है, तब वे क्रोध से भरकर गदा लेकर रावण की ओर दौड़े और बोले— “अरे दुर्भाग्यशाली, मूर्ख और दुष्ट बुद्धि वाले! तू देवताओं, मनुष्यों, मुनियों और नागों—सबका शत्रु बना हुआ है। तूने आदरपूर्वक भगवान शिव को अपने सिर अर्पित किए थे और बदले में अनेक वरदान पाए थे। उसी के कारण अब तक जीवित बचा हुआ है, पर अब तेरा काल तेरे सिर पर नाच रहा है। हे दुष्ट! जो राम से विमुख होकर संपत्ति चाहता है, वह कभी सुख नहीं पा सकता।”
ऐसा कहकर विभीषण ने रावण की छाती पर जोरदार गदा प्रहार किया।
छंद में वर्णन है कि वह अत्यंत कठोर गदा प्रहार रावण के हृदय पर लगा और वह भूमि पर गिर पड़ा। उसके दसों मुखों से रक्त बहने लगा, फिर भी वह संभलकर क्रोध में भरकर पुनः युद्ध के लिए दौड़ा। दोनों महाबली योद्धा मल्लयुद्ध करने लगे और एक-दूसरे को मारने का प्रयास करने लगे। विभीषण, जो श्रीराम के बल के कारण निर्भय और गर्वित थे, रावण को कुछ भी नहीं समझ रहे थे।
विस्तृत विवेचन
यह प्रसंग श्रीराम के शरणागतवत्सल स्वरूप, विभीषण की भक्ति और वीरता, तथा रावण के अहंकार को प्रकट करता है।
1. श्रीराम का शरणागत-धर्म
“प्रनतारति भंजन पन मोरा” — श्रीराम कहते हैं कि शरण में आए हुए व्यक्ति की रक्षा करना मेरा प्रण है।
विभीषण ने श्रीराम की शरण ली थी, इसलिए जब रावण की शक्ति उनकी ओर आई, तब भगवान ने स्वयं उस प्रहार को सह लिया। इससे भगवान की करुणा, दया और भक्त-रक्षा की भावना स्पष्ट होती है।
2. भगवान की लीला
शक्ति लगने पर श्रीराम का मूर्छित होना वास्तव में उनकी मानव-लीला का भाग था। वे सर्वशक्तिमान होते हुए भी मानव रूप में युद्ध की मर्यादा निभा रहे थे। देवताओं का व्याकुल होना यह दिखाता है कि समस्त जगत का आधार स्वयं श्रीराम हैं।
3. विभीषण का धर्म और क्रोध
विभीषण अपने प्रभु को कष्ट में देखकर क्रोध से भर उठते हैं। उनका क्रोध व्यक्तिगत नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा के लिए है। वे रावण को उसके पापों और अहंकार का स्मरण कराते हैं।
4. रावण का अहंकार
रावण ने शिवजी की आराधना करके वरदान तो प्राप्त किए, परंतु उनका उपयोग अधर्म के लिए किया। तुलसीदास जी बताते हैं कि भगवान से विमुख होकर प्राप्त की गई संपत्ति और शक्ति अंततः विनाश का कारण बनती है।
5. मल्लयुद्ध का चित्रण
छंद में युद्ध का अत्यंत वीरतापूर्ण वर्णन है। विभीषण अब भयमुक्त हैं क्योंकि उन्हें श्रीराम का आश्रय प्राप्त है। दूसरी ओर रावण अहंकार में भरा हुआ है। यह युद्ध केवल दो योद्धाओं का नहीं, बल्कि धर्म और अधर्म का संघर्ष है।
शिक्षाएँ
जो भगवान की शरण में आता है, भगवान उसकी रक्षा अवश्य करते हैं।
अहंकार और अधर्म अंततः विनाश का कारण बनते हैं।
सच्चा भक्त अपने स्वामी और धर्म की रक्षा के लिए निर्भय रहता है।
भगवान से विमुख होकर प्राप्त वैभव स्थायी नहीं होता।
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