लंकाकांड दोहा (90)
लंकाकांड दोहा (90) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दो0-राम बचन सुनि बिहँसा मोहि सिखावत ग्यान।
बयरु करत नहिं तब डरे अब लागे प्रिय प्रान।।90।।
भावार्थ :
इस दोहे में रावण, श्रीराम के वचनों को सुनकर हँसता है और कहता है—“तुम मुझे ज्ञान सिखा रहे हो! जब मैं तुमसे बैर (शत्रुता) कर रहा था, तब तुम नहीं डरा, और अब क्या तुम्हें अपने प्राण प्रिय लगने लगे हैं?”
अर्थात रावण अहंकार में भरकर श्रीराम की बातों को तुच्छ समझता है और अपनी वीरता पर घमंड करता है।
विस्तृत विवेचन:
यह दोहा रावण के अहंकार और अज्ञान को स्पष्ट करता है। जब श्रीराम उसे समझाते हैं कि युद्ध छोड़कर सही मार्ग अपनाए, तब रावण उस उपदेश का मज़ाक उड़ाता है। वह हँसते हुए कहता है कि मुझे ज्ञान मत सिखाओ, जब दुश्मनी ली थी तो अब डर क्यों रहे हो?
यहाँ रावण की मानसिकता दिखती है—
वह अपनी शक्ति और विजय के घमंड में अंधा हो चुका है।
उसे सही और गलत का ज्ञान होते हुए भी वह स्वीकार नहीं करता।
वह यह मानता है कि डरना कमजोरी है, इसलिए वह अपनी गलती नहीं मानता।
दूसरी ओर, श्रीराम धर्म और करुणा के प्रतीक हैं। वे युद्ध से पहले भी रावण को सुधारने का अवसर देते हैं, लेकिन रावण का अहंकार उसे विनाश की ओर ले जाता है।
मुख्य संदेश:
अहंकार मनुष्य का विनाश करता है।
सही सलाह को ठुकराने से अंत में हानि ही होती है।
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