लंकाकांड दोहा (91)

 लंकाकांड दोहा (91) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दो0-तानेउ चाप श्रवन लगि छाँड़े बिसिख कराल।

राम मारगन गन चले लहलहात जनु ब्याल।।91।।

रामचरितमानस के लंका कांड का यह दोहा युद्ध के अत्यंत भयानक और रोमांचक दृश्य का वर्णन करता है।

दोहा :

“तानेउ चाप श्रवन लगि छाँड़े बिसिख कराल।

राम मारगन गन चले लहलहात जनु ब्याल।।91।।"

भावार्थ

रावण ने अपने धनुष को कान तक खींचकर अत्यंत भयंकर बाण छोड़े। तब भगवान श्रीराम के बाण समूह ऐसे वेग से चलने लगे मानो फुफकारते हुए सर्प लहराते हुए आगे बढ़ रहे हों।

विस्तृत विवेचन

इस दोहे में कवि गोस्वामी तुलसीदास ने युद्ध की उग्रता और श्रीराम के पराक्रम का अत्यंत प्रभावशाली चित्र प्रस्तुत किया है।

रावण अत्यधिक क्रोध में भरकर अपने धनुष को पूरी शक्ति से कान तक खींचता है और भयानक बाणों की वर्षा करता है। “बिसिख कराल” शब्द रावण के बाणों की भयावहता को प्रकट करता है। इससे युद्ध का वातावरण और भी भीषण बन जाता है।

इसके उत्तर में श्रीराम भी अपने तीक्ष्ण बाण चलाते हैं। तुलसीदास जी ने श्रीराम के बाणों की तुलना लहराते हुए विषैले सर्पों से की है। “लहलहात जनु ब्याल” उपमा अत्यंत सुंदर और प्रभावशाली है। इससे बाणों की गति, तीव्रता और भयंकरता का जीवंत चित्र आँखों के सामने उपस्थित हो जाता है।

यह दोहा केवल युद्ध का वर्णन नहीं करता, बल्कि यह भी दिखाता है कि श्रीराम का पराक्रम रावण से कहीं अधिक महान है। रावण के बाण भले ही भयंकर हों, परंतु श्रीराम के बाण दिव्य शक्ति और धर्म की विजय के प्रतीक हैं।

काव्य सौंदर्य

उपमा अलंकार — श्रीराम के बाणों की तुलना सर्पों से की गई है।

चित्रात्मक शैली — युद्ध का दृश्य सजीव बन गया है।

वीर रस — पूरे दोहे में वीरता और उत्साह का प्रभाव है।

संदेश

यह दोहा धर्म और अधर्म के संघर्ष को दर्शाता है। अंततः सत्य, धर्म और मर्यादा की शक्ति ही विजयी होती है।


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