लंकाकांड दोहा (92)
लंकाकांड दोहा (92) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दो0-जिमि जिमि प्रभु हर तासु सिर तिमि तिमि होहिं अपार।
सेवत बिषय बिबर्ध जिमि नित नित नूतन मार।।92।।
भावार्थ
इस दोहे में वर्णन है कि युद्ध के समय भगवान श्रीराम रावण के जितने सिर काटते थे, उतने ही नए सिर फिर उत्पन्न हो जाते थे। यह दृश्य ऐसा था मानो विषय-वासना (भोगों की इच्छा) की तरह हो, जो जितनी अधिक भोगी जाती है उतनी ही बढ़ती जाती है और मनुष्य को नए-नए दुःख देती रहती है।
विस्तृत विवेचन
यह दोहा रामचरितमानस में रावण और श्रीराम के भयंकर युद्ध का अत्यंत गूढ़ दार्शनिक वर्णन प्रस्तुत करता है। तुलसीदास जी केवल युद्ध का दृश्य नहीं दिखाते, बल्कि उसके माध्यम से मानव जीवन का सत्य भी समझाते हैं।
युद्ध में भगवान श्रीराम बार-बार रावण के सिर काटते हैं, परंतु उसके सिर समाप्त नहीं होते। जैसे ही एक सिर गिरता है, दूसरा प्रकट हो जाता है। यह रावण की मायावी शक्ति का प्रतीक है।
तुलसीदास जी इसकी तुलना विषय-भोगों से करते हैं। मनुष्य सोचता है कि किसी इच्छा को पूरा कर लेने से तृष्णा समाप्त हो जाएगी, परंतु वास्तव में इच्छा और बढ़ जाती है। धन, कामना, लोभ, अहंकार और भोग — ये सब ऐसे ही हैं। जितना मनुष्य इनके पीछे भागता है, उतनी ही नई इच्छाएँ उत्पन्न होती रहती हैं।
“नित नित नूतन मार” का अर्थ है कि विषय-वासना मनुष्य को प्रतिदिन नए दुःख देती है। पहले इच्छा उत्पन्न होती है, फिर उसे पाने की चिंता, पाने के बाद खोने का भय, और न मिलने पर दुख — इस प्रकार मनुष्य निरंतर मानसिक कष्ट भोगता रहता है।
यहाँ रावण केवल एक राक्षस नहीं है, बल्कि मानव के भीतर मौजूद अहंकार, वासना और मोह का प्रतीक है। भगवान श्रीराम ज्ञान, धर्म और आत्मबल के प्रतीक हैं। जब तक मनुष्य के भीतर विषयों की आसक्ति बनी रहती है, तब तक उसका अंत नहीं होता।
काव्य सौंदर्य
उपमा अलंकार का सुंदर प्रयोग हुआ है।
रावण के सिरों की तुलना विषय-वासना से की गई है।
दोहे में गहरा आध्यात्मिक और नैतिक संदेश छिपा है।
भाषा अत्यंत सरल, परंतु अर्थ अत्यंत गंभीर है।
शिक्षा
यह दोहा सिखाता है कि विषय-भोग और इच्छाएँ कभी समाप्त नहीं होतीं। मनुष्य को संयम, भक्ति और विवेक का मार्ग अपनाना चाहिए, तभी जीवन में वास्तविक शांति प्राप्त हो सकती है।
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