लंकाकांड दोहा (93)
लंकाकांड दोहा (93) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दो0-पुनि दसकंठ क्रुद्ध होइ छाँड़ी सक्ति प्रचंड।
चली बिभीषन सन्मुख मनहुँ काल कर दंड।।93।।
भावार्थ
फिर रावण अत्यंत क्रोधित होकर अपनी भयंकर शक्ति (अस्त्र) को छोड़ता है। वह प्रचंड शक्ति विभीषण की ओर इस प्रकार बढ़ती है, मानो स्वयं काल का दंड उन्हें दंड देने के लिए चला आ रहा हो।
विस्तृत विवेचन
यह दोहा रामचरितमानस के लंकाकांड का है। इसमें युद्धभूमि का अत्यंत भयावह और रोमांचकारी दृश्य प्रस्तुत किया गया है। रावण अपने भाई विभीषण को देखकर क्रोध से भर उठता है, क्योंकि विभीषण ने अधर्म का साथ छोड़कर भगवान राम की शरण ग्रहण कर ली थी। रावण इसे विश्वासघात मानता है।
क्रोध में आकर रावण अपनी प्रचंड “शक्ति” नामक अस्त्र को विभीषण की ओर छोड़ता है। यह अस्त्र इतना भयानक था कि उसकी तुलना “काल के दंड” से की गई है। यहाँ “काल” मृत्यु और विनाश का प्रतीक है। कवि कहना चाहते हैं कि वह शक्ति इतनी भयंकर थी मानो मृत्यु स्वयं विभीषण को समाप्त करने चली हो।
इस दोहे में रावण का अहंकार, क्रोध और प्रतिशोध की भावना स्पष्ट दिखाई देती है। दूसरी ओर विभीषण धर्म और सत्य के पक्ष में खड़े हैं। तुलसीदास जी यह संदेश देते हैं कि अधर्मी व्यक्ति अपने ही संबंधियों के प्रति भी कठोर हो जाता है।
काव्य सौंदर्य
उपमा अलंकार — “मनहुँ काल कर दंड” में शक्ति की तुलना काल के दंड से की गई है।
वीर रस — युद्ध का उग्र और भयानक वातावरण वीर रस उत्पन्न करता है।
चित्रात्मकता — शक्ति अस्त्र के वेग और भयावहता का अत्यंत सजीव चित्रण हुआ है।
शिक्षा
यह दोहा सिखाता है कि क्रोध और अहंकार मनुष्य को अंधा बना देते हैं। धर्म का मार्ग कठिन अवश्य होता है, पर अंततः विजय उसी की होती है।
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