लंकाकांड चौपाई (844-853)एवं छंद

 लंकाकांड चौपाई (844-853) एवं छंद का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

अस कहि रथ रघुनाथ चलावा। बिप्र चरन पंकज सिरु नावा।।

तब लंकेस क्रोध उर छावा। गर्जत तर्जत सन्मुख धावा।।

जीतेहु जे भट संजुग माहीं। सुनु तापस मैं तिन्ह सम नाहीं।।

रावन नाम जगत जस जाना। लोकप जाकें बंदीखाना।।

खर दूषन बिराध तुम्ह मारा। बधेहु ब्याध इव बालि बिचारा।।

निसिचर निकर सुभट संघारेहु। कुंभकरन घननादहि मारेहु।।

आजु बयरु सबु लेउँ निबाही। जौं रन भूप भाजि नहिं जाहीं।।

आजु करउँ खलु काल हवाले। परेहु कठिन रावन के पाले।।

सुनि दुर्बचन कालबस जाना। बिहँसि बचन कह कृपानिधाना।।

सत्य सत्य सब तव प्रभुताई। जल्पसि जनि देखाउ मनुसाई।।

छं0-जनि जल्पना करि सुजसु नासहि नीति सुनहि करहि छमा।

संसार महँ पूरुष त्रिबिध पाटल रसाल पनस समा।।

एक सुमनप्रद एक सुमन फल एक फलइ केवल लागहीं।

एक कहहिं कहहिं करहिं अपर एक करहिं कहत न बागहीं।।

भावार्थ:

चौपाई:

राम जी रथ चलाने से पहले ब्राह्मणों के चरणों में प्रणाम करते हैं।

उधर रावण क्रोध से भरकर गरजते हुए युद्ध के लिए सामने आता है।

रावण घमंड में कहता है—

हे तपस्वी (राम)! मैंने युद्ध में बड़े-बड़े योद्धाओं को हराया है, तुम उनके समान भी नहीं हो।

मेरा नाम पूरे संसार में प्रसिद्ध है, बड़े-बड़े देवता भी मेरे बंदी हैं।

तुमने खर-दूषण, बाली आदि को मारा और कई राक्षसों का वध किया, लेकिन आज मैं तुमसे बदला लूँगा।

अगर तुम भागे नहीं, तो आज तुम्हें मृत्यु के हवाले कर दूँगा।

रावण के कठोर वचन सुनकर राम जी मुस्कराते हैं और कहते हैं—

तुम्हारी शक्ति सच है, परंतु व्यर्थ की बातें करके अपनी मानवता (मर्यादा) मत खोओ।

छंद:

राम जी कहते हैं—

व्यर्थ की डींगें मारकर अपनी अच्छी कीर्ति नष्ट मत करो, नीति की बात सुनो और क्षमा करो।

इस संसार में तीन प्रकार के पुरुष होते हैं—

फूल जैसे – जो केवल बातें करते हैं

आम जैसे – जो बातें भी करते हैं और फल (कार्य) भी देते हैं

कटहल जैसे – जो बिना बोले केवल काम करते हैं

कुछ लोग केवल कहते हैं, कुछ कहते और करते हैं, और कुछ बिना बोले ही कार्य कर जाते हैं।

🔹 विस्तृत विवेचन

यह प्रसंग राम और रावण के चरित्र का स्पष्ट अंतर दिखाता है।

रावण का स्वभाव: अहंकार, क्रोध और डींग मारना। वह अपनी शक्ति का बखान करता है और सामने वाले को छोटा दिखाता है।

राम का स्वभाव: शांति, विनम्रता और नीति। वे रावण को भी सही मार्ग अपनाने की सलाह देते हैं।

राम यहाँ एक गहरी जीवन शिक्षा देते हैं—

👉 सच्चा महान व्यक्ति वह है जो काम करता है, न कि केवल बातें।

इस छंद में तीन प्रकार के मनुष्यों की तुलना बहुत सुंदर ढंग से की गई है:

पाटल (फूल) → केवल दिखावा

रसाल (आम) → संतुलित (बात + काम)

पनस (कटहल) → कर्मप्रधान (केवल काम)

🔹 निष्कर्ष (2 point में)

अहंकार और डींग मारना व्यक्ति को पतन की ओर ले जाता है।

सच्ची महानता कर्म में है, न कि केवल शब्दों में।

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