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Showing posts from January, 2026

लंकाकांड चौपाई (346-354)

 लंकाकांड चौपाई (346-354) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: नारि बचन सुनि बिसिख समाना। सभाँ गयउ उठि होत बिहाना।। बैठ जाइ सिंघासन फूली। अति अभिमान त्रास सब भूली।। इहाँ राम अंगदहि बोलावा। आइ चरन पंकज सिरु नावा।। अति आदर सपीप बैठारी। बोले बिहँसि कृपाल खरारी।। बालितनय कौतुक अति मोही। तात सत्य कहु पूछउँ तोही।।। रावनु जातुधान कुल टीका। भुज बल अतुल जासु जग लीका।। तासु मुकुट तुम्ह चारि चलाए। कहहु तात कवनी बिधि पाए।। सुनु सर्बग्य प्रनत सुखकारी। मुकुट न होहिं भूप गुन चारी।। साम दान अरु दंड बिभेदा। नृप उर बसहिं नाथ कह बेदा।। भावार्थ: जब रावण ने मंदोदरी की बात सुनकर उसे तीर के समान चुभने वाली लगी, तो वह सभा में जाकर सिंहासन पर बैठ गया। अहंकार में भरकर वह सब भय भूल गया। इधर भगवान श्रीराम ने अंगद को बुलाया। अंगद आए और चरणों में सिर नवाया। प्रभु ने प्रेम से पास बैठाकर हँसते हुए कहा — “हे बालि के पुत्र! मुझे बड़ा कौतूहल हो रहा है। सच-सच बताओ, रावण जैसा पराक्रमी, जिसके बल की चर्चा पूरे संसार में है, उसके मुकुट तुमने चारों ओर कैसे उछाल दिए?” तब अंगद बोले — “हे सर्वज्ञ, शरणागतों को सुख देने वाले प्रभु!...

लंका काण्ड दोहा (38)

 लंका काण्ड दोहा 38 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0-दुइ सुत मरे दहेउ पुर अजहुँ पूर पिय देहु। कृपासिंधु रघुनाथ भजि नाथ बिमल जसु लेहु।।37।। भावार्थ : मंदोदरी रावण को समझाने का प्रयास करती है  हे रावण! आपके दो पुत्र मारे जा चुके हैं और आपकी लंका जलकर भस्म हो गई है, फिर भी आपकी बुद्धि अभी तक नहीं आई। अब भी अभिमान छोड़कर कृपासागर भगवान श्रीराम की शरण में जाएं और उनका निर्मल यश प्राप्त करें। विस्तृत विवेचन : यह दोहा श्रीरामचरितमानस के लंका काण्ड में आता है। यह रावण को समझाने के लिए कहा गया उपदेश है। रावण की हठ और अहंकार रावण के दो पुत्र (हनुमान के द्वारा अक्षय कुमार और अंगद द्वारा एक पुत्र) मारे जा चुके हैं। हनुमान जी ने लंका जला दी, फिर भी रावण का अहंकार नहीं टूटा। अभी भी अवसर शेष है मंदोदरी कहती है कि अभी भी समय है। यदि रावण चाहें तो श्रीराम की शरण में जाकर अपने पापों से मुक्त हो सकता है। राम की करुणा श्रीराम ‘कृपासिंधु’ हैं — करुणा के सागर। जो भी सच्चे मन से उनकी शरण में आता है, वे उसे स्वीकार कर लेते हैं। जीवन का संदेश यह दोहा हमें सिखाता है कि अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्...

लंका काण्ड चौपाई (338-345)

 लंकाकांड चौपाई (338-345) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: जेहिं जलनाथ बँधायउ हेला। उतरे प्रभु दल सहित सुबेला।। कारुनीक दिनकर कुल केतू। दूत पठायउ तव हित हेतू।। सभा माझ जेहिं तव बल मथा। करि बरूथ महुँ मृगपति जथा।। अंगद हनुमत अनुचर जाके। रन बाँकुरे बीर अति बाँके।। तेहि कहँ पिय पुनि पुनि नर कहहू। मुधा मान ममता मद बहहू।। अहह कंत कृत राम बिरोधा। काल बिबस मन उपज न बोधा।। काल दंड गहि काहु न मारा। हरइ धर्म बल बुद्धि बिचारा।। निकट काल जेहि आवत साईं। तेहि भ्रम होइ तुम्हारिहि नाईं।। भावार्थ जिस श्रीराम ने समुद्र पर सेतु बनवाकर अपनी वानर सेना सहित सहज ही लंका में प्रवेश किया, जो करुणामय सूर्यवंश के भूषण हैं और जिन्होंने तुम्हारे कल्याण के लिए दूत (अंगद )भेजा, जिसने सभा में तुम्हारे बल का नाश किया, जैसे सिंह हाथियों के समूह को तितर-बितर कर देता है। जिनके अंगद और हनुमान जैसे पराक्रमी योद्धा सेवक हैं, उन श्रीराम को तुम बार-बार साधारण मनुष्य क्यों कहते हो? व्यर्थ ही अहंकार, ममता और मद में डूबे हो। हाय! हे स्वामी! तुमने श्रीराम से विरोध करके विनाश को बुला लिया है। काल के वश में होकर तुम्हारी बुद्धि न...

लंका काण्ड दोहा (37)

  दो0-बधि बिराध खर दूषनहि लीँलाँ हत्यो कबंध। बालि एक सर मारयो तेहि जानहु दसकंध।।36।। भावार्थ मंदोदरी रावण को समझाते हुए कहती है: हे दशानन (रावण)! श्रीराम ने वीराध, खर-दूषण और कबन्ध जैसे महाबली राक्षसों का वध किया, तथा बाली को एक ही बाण से मार गिराया। इसलिए उनके पराक्रम को पहचानो और समझो कि उनसे युद्ध करना विनाश को बुलाना है। विस्तृत विवेचन इस दोहे में रावण को श्रीराम की अपार शक्ति और शौर्य का स्मरण कराया जा रहा है। मंदोदरी उदाहरण देकर बताती है कि— वीराध, खर-दूषण और कबन्ध का वध – ये सभी अत्यंत बलवान राक्षस थे, जिन्हें श्रीराम ने सहजता से पराजित किया। इससे राम की अद्भुत वीरता सिद्ध होती है। बाली का एक बाण से संहार – बाली जैसा महापराक्रमी योद्धा भी श्रीराम के एक ही बाण से मारा गया, जो राम के दिव्य पराक्रम का प्रमाण है। भाव यह है कि  मंदोदरी रावण को अहंकार त्यागकर राम की शक्ति को समझने को कहती है।उनसे युद्ध करना अपनी ही पराजय को बुलाने जैसा है।

लंका काण्ड चौपाई (325-337)

 लंका काण्ड चौपाई ( 325-337)का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: कंत समुझि मन तजहु कुमतिही। सोह न समर तुम्हहि रघुपतिही।। रामानुज लघु रेख खचाई। सोउ नहिं नाघेहु असि मनुसाई।। पिय तुम्ह ताहि जितब संग्रामा। जाके दूत केर यह कामा।। कौतुक सिंधु नाघी तव लंका। आयउ कपि केहरी असंका।। रखवारे हति बिपिन उजारा। देखत तोहि अच्छ तेहिं मारा।। जारि सकल पुर कीन्हेसि छारा। कहाँ रहा बल गर्ब तुम्हारा।। अब पति मृषा गाल जनि मारहु। मोर कहा कछु हृदयँ बिचारहु।। पति रघुपतिहि नृपति जनि मानहु। अग जग नाथ अतुल बल जानहु।। बान प्रताप जान मारीचा। तासु कहा नहिं मानेहि नीचा।। जनक सभाँ अगनित भूपाला। रहे तुम्हउ बल अतुल बिसाला।। भंजि धनुष जानकी बिआही। तब संग्राम जितेहु किन ताही।। सुरपति सुत जानइ बल थोरा। राखा जिअत आँखि गहि फोरा।। सूपनखा कै गति तुम्ह देखी। तदपि हृदयँ नहिं लाज बिषेषी।। भावार्थ : मंदोदरी रावण को समझाती है कि वह अपनी गलत बुद्धि छोड़ दे और श्रीराम से युद्ध करने का विचार त्याग दे, क्योंकि राम के सामने उसकी शक्ति कुछ भी नहीं है। जिस राम का छोटा-सा सेवक हनुमान समुद्र लांघकर लंका आ गया, रक्षक मार डाले, वन उजाड़ दिया और प...

लंका काण्ड दोहा (36)

 लंका काण्ड दोहा 36 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0-रिपु बल धरषि हरषि कपि बालितनय बल पुंज। पुलक सरीर नयन जल गहे राम पद कंज।।35(क)।। साँझ जानि दसकंधर भवन गयउ बिलखाइ। मंदोदरी रावनहि बहुरि कहा समुझाइ।।(ख)।। भावार्थ (क) शत्रुओं की सेना को पराजित कर बालीपुत्र अंगद अत्यंत प्रसन्न हुए। उनके शरीर में रोमांच हो आया, आँखों में प्रेमाश्रु भर आए और वे भगवान श्रीराम के चरणकमलों में लीन हो गए। (ख) संध्या होने पर रावण रोता-बिलखता अपने भवन लौट गया। तब मंदोदरी ने उसे फिर समझाया और नीति की बात कही। 🔹 विस्तृत विवेचन (क) अंगद की वीरता और भक्ति इस दोहे में अंगद के पराक्रम और भक्ति – दोनों का सुंदर चित्रण है। अंगद ने रावण की पूरी सभा और योद्धाओं को अपने बल से आतंकित कर दिया। शत्रु-सेना को पराजित कर वे हर्ष से भर गए। लेकिन यह हर्ष अहंकार का नहीं, रामभक्ति का हर्ष था। उनके शरीर में पुलक (रोमांच) और आँखों में प्रेम के आँसू आ गए। वे सारा श्रेय प्रभु श्रीराम को देकर उनके चरणों में मन अर्पित कर देते हैं। यह दर्शाता है कि सच्चा वीर वही है जो जीत के बाद भी विनम्र और भक्त बना रहे। (ख) रावण की हार और मंदोदरी...

लंका काण्ड चौपाई ((312-324)

 लंका काण्ड चौपाई (312-324) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: कपि बल देखि सकल हियँ हारे। उठा आपु कपि कें परचारे।। गहत चरन कह बालिकुमारा। मम पद गहें न तोर उबारा।। गहसि न राम चरन सठ जाई। सुनत फिरा मन अति सकुचाई।। भयउ तेजहत श्री सब गई। मध्य दिवस जिमि ससि सोहई।। सिंघासन बैठेउ सिर नाई। मानहुँ संपति सकल गँवाई।। जगदातमा प्रानपति रामा। तासु बिमुख किमि लह बिश्रामा।। उमा राम की भृकुटि बिलासा। होइ बिस्व पुनि पावइ नासा।। तृन ते कुलिस कुलिस तृन करई। तासु दूत पन कहु किमि टरई।। पुनि कपि कही नीति बिधि नाना। मान न ताहि कालु निअराना।। रिपु मद मथि प्रभु सुजसु सुनायो। यह कहि चल्यो बालि नृप जायो।। हतौं न खेत खेलाइ खेलाई। तोहि अबहिं का करौं बड़ाई।। प्रथमहिं तासु तनय कपि मारा। सो सुनि रावन भयउ दुखारा।। जातुधान अंगद पन देखी। भय ब्याकुल सब भए बिसेषी।। भावार्थ कपि बल देखि सकल हियँ हारे। उठा आपु कपि कें परचारे।। अंगद का अद्भुत बल देखकर राक्षसों के हृदय भय से भर गए। तब रावण स्वयं उठकर अंगद का पैर उठाने आया। गहत चरन कह बालिकुमारा। मम पद गहें न तोर उबारा।। अंगद  रावण से कहता है – मेरे पैर पकड़ने से तुम्हारा त...

लंका काण्ड दोहा (35)

 लंका काण्ड दोहा 35 का भावार्थ सहित विस्तृत  विवेचन: दो0-कोटिन्ह मेघनाद सम सुभट उठे हरषाइ। झपटहिं टरै न कपि चरन पुनि बैठहिं सिर नाइ।।34(क)।। भूमि न छाँडत कपि चरन देखत रिपु मद भाग।। कोटि बिघ्न ते संत कर मन जिमि नीति न त्याग।।34(ख)।। भावार्थ (34 क) मेघनाद जैसे करोड़ों पराक्रमी योद्धा उत्साह से उठकर अंगद पर झपटते हैं, परन्तु वे कपिराज अंगद के चरणों को हिला नहीं पाते। अंततः हार मानकर उनके चरणों में सिर झुका देते हैं। (34 ख) अंगद अपने चरण भूमि से नहीं हटाते। शत्रुओं का घमंड टूटता हुआ देखकर वे अडिग रहते हैं। जैसे सच्चा संत असंख्य विघ्नों के बीच भी नीति (धर्म-पथ) नहीं छोड़ता, वैसे ही अंगद भी अचल रहते हैं। विस्तृत विवेचन यह प्रसंग अंगद के अचल पराक्रम और नैतिक दृढ़ता का प्रतीक है। रावण की सभा में अंगद ने चुनौती दी कि जो उनके चरण को हिला दे, वही सीता को ले जाए। इससे लंका के वीरों का अहंकार जाग उठा। राक्षसी शक्ति का परीक्षण मेघनाद जैसे असाधारण योद्धा और उनके समान असंख्य वीर पूरे वेग से झपटते हैं, पर अंगद के चरण टस से मस नहीं होते। यहाँ तुलसीदास जी दिखाते हैं कि धर्मबल, बाहुबल से श्रेष्ठ ...

लंका काण्ड चौपाई (298-311)

 लंका काण्ड चौपाई 298-311 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: मै तव दसन तोरिबे लायक। आयसु मोहि न दीन्ह रघुनायक।। असि रिस होति दसउ मुख तोरौं। लंका गहि समुद्र महँ बोरौं।। गूलरि फल समान तव लंका। बसहु मध्य तुम्ह जंतु असंका।। मैं बानर फल खात न बारा। आयसु दीन्ह न राम उदारा।। जुगति सुनत रावन मुसुकाई। मूढ़ सिखिहि कहँ बहुत झुठाई।। बालि न कबहुँ गाल अस मारा। मिलि तपसिन्ह तैं भएसि लबारा।। साँचेहुँ मैं लबार भुज बीहा। जौं न उपारिउँ तव दस जीहा।। समुझि राम प्रताप कपि कोपा। सभा माझ पन करि पद रोपा।। जौं मम चरन सकसि सठ टारी। फिरहिं रामु सीता मैं हारी।। सुनहु सुभट सब कह दससीसा। पद गहि धरनि पछारहु कीसा।। इंद्रजीत आदिक बलवाना। हरषि उठे जहँ तहँ भट नाना।। झपटहिं करि बल बिपुल उपाई। पद न टरइ बैठहिं सिरु नाई।। पुनि उठि झपटहीं सुर आराती। टरइ न कीस चरन एहि भाँती।। पुरुष कुजोगी जिमि उरगारी। मोह बिटप नहिं सकहिं उपारी।। यह प्रसंग उस समय का है जब श्रीराम जी ने अंगद जी को दूत बनाकर लंका भेजा। अंगद जी रावण को अंतिम अवसर देने आए थे कि वह माता सीता लौटा दे और राम की शरण स्वीकार कर ले। पर रावण अहंकार में डूबा हुआ था। तब अंग...

लंका काण्ड दोहा (34)

 लंका काण्ड दोहा 34 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: सो0-सो नर क्यों दसकंध बालि बध्यो जेहिं एक सर। बीसहुँ लोचन अंध धिग तव जन्म कुजाति जड़।।33(क)।। तब सोनित की प्यास तृषित राम सायक निकर। तजउँ तोहि तेहि त्रास कटु जल्पक निसिचर अधम।।33(ख)।। भावार्थ एवं विस्तृत विवेचन : 🔹 सोरठा (33 क) पंक्तियाँ: सो नर क्यों दसकंध बालि बध्यो जेहिं एक सर। बीसहुँ लोचन अंध धिग तव जन्म कुजाति जड़।। भावार्थ: अंगद रावण से कहता है  जिस राम ने एक ही बाण से बलशाली बालि का वध कर दिया, उस वीर पुरुष (राम) को तुम क्यों साधारण मनुष्य समझ रहे हो? हे रावण! तेरी बीस आँखें होते हुए भी तू अंधा है। तेरी बुद्धि जड़ है और तेरा जन्म ही धिक्कार योग्य है। विवेचन: यहाँ अंगद रावण की मूर्खता और अहंकार पर कटाक्ष कर रहे हैं। जो राम बालि जैसे महावीर को मार सकते हैं, उनसे टकराना रावण की अज्ञानता है। उसकी शक्ति और आँखें होने पर भी विवेक नहीं है। 🔹 दोहा (33 ख) पंक्तियाँ: तब सोनित की प्यास तृषित राम सायक निकर। तजउँ तोहि तेहि त्रास कटु जल्पक निसिचर अधम।। भावार्थ: अब राम के बाण रक्त की प्यास से तृषित हैं। हे अधम राक्षस! तेरे कटु वचनों ...

लंका काण्ड चौपाई (289-297)

 लंका काण्ड चौपाई  289-297 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: एहि बिधि बेगि सूभट सब धावहु। खाहु भालु कपि जहँ जहँ पावहु।। मर्कटहीन करहु महि जाई। जिअत धरहु तापस द्वौ भाई।। पुनि सकोप बोलेउ जुबराजा। गाल बजावत तोहि न लाजा।। मरु गर काटि निलज कुलघाती। बल बिलोकि बिहरति नहिं छाती।। रे त्रिय चोर कुमारग गामी। खल मल रासि मंदमति कामी।। सन्यपात जल्पसि दुर्बादा। भएसि कालबस खल मनुजादा।। याको फलु पावहिगो आगें। बानर भालु चपेटन्हि लागें।। रामु मनुज बोलत असि बानी। गिरहिं न तव रसना अभिमानी।। गिरिहहिं रसना संसय नाहीं। सिरन्हि समेत समर महि माहीं।। भावार्थ (सरल अर्थ) रावण क्रोध में अपने वीरों को आदेश देता है— “इस प्रकार शीघ्र ही सब योद्धा दौड़ पड़ो और जहाँ-जहाँ वानर और भालू मिलें, उन्हें खा जाओ। धरती को वानर-शून्य कर दो। उन दोनों तपस्वी भाइयों (राम–लक्ष्मण) को जीवित पकड़ लाओ।” क्रोधित होकर युवराज अंगद  कहता है— “अरे निर्लज्ज! मेरे सामने डींग मारते हुए तुझे लज्जा नहीं आती? तू कुलघाती है, गला काटने योग्य है। मेरे बल को देखकर भी तेरा हृदय नहीं काँपता?” इसके बाद वह अंगद रावण को अपमानित करते हुए कहता है...

लंका काण्ड दोहा (33)

 लंका काण्ड दोहा 33 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0-तरकि पवनसुत कर गहे आनि धरे प्रभु पास। कौतुक देखहिं भालु कपि दिनकर सरिस प्रकास।।32(क)।। उहाँ सकोपि दसानन सब सन कहत रिसाइ। धरहु कपिहि धरि मारहु सुनि अंगद मुसुकाइ।।32(ख)।। भावार्थ पवनपुत्र हनुमान उछलकर आए और उस मुकुट को जिसे अंगद ने फेका था, पकड़कर प्रभु राम के पास ले आए। उस दृश्य को भालू और वानर बड़े कौतुक से देखते हैं; हनुमान सूर्य के समान तेजस्वी दिखाई पड़ते हैं। उधर क्रोधित रावण सभा में सबको आदेश देता है— “इस कपि को पकड़ो और मार डालो।” यह सुनकर अंगद मुस्करा उठते हैं। विस्तृत विवेचन यह प्रसंग लंका की सभा में राम-दूत (हनुमान) के पराक्रम और रावण के अहंकार को उजागर करता है। 1) हनुमान का शौर्य और तेज हनुमान पवनपुत्र हैं—अतुल बल, वेग और बुद्धि के प्रतीक। “तरकि” (उछलकर) आना उनके अद्भुत वेग को दर्शाता है। शत्रु के बीच निर्भीक होकर दूत को पकड़ लाना उनके आत्मविश्वास और प्रभु-कार्य के प्रति निष्ठा का प्रमाण है। कवि ने उनके तेज को “दिनकर सरिस” कहा—अर्थात् सूर्य के समान प्रकाशमान, जिससे वानर-भालू अचंभित होकर यह कौतुक देखते हैं। 2) रावण का...

लंका काण्ड चौपाई (279-288)

 लंका काण्ड चौपाई 279-288 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: जब तेहिं कीन्ह राम कै निंदा। क्रोधवंत अति भयउ कपिंदा।। हरि हर निंदा सुनइ जो काना। होइ पाप गोघात समाना।। कटकटान कपिकुंजर भारी। दुहु भुजदंड तमकि महि मारी।। डोलत धरनि सभासद खसे। चले भाजि भय मारुत ग्रसे।। गिरत सँभारि उठा दसकंधर। भूतल परे मुकुट अति सुंदर।। कछु तेहिं लै निज सिरन्हि सँवारे। कछु अंगद प्रभु पास पबारे।। आवत मुकुट देखि कपि भागे। दिनहीं लूक परन बिधि लागे।। की रावन करि कोप चलाए। कुलिस चारि आवत अति धाए।। कह प्रभु हँसि जनि हृदयँ डेराहू। लूक न असनि केतु नहिं राहू।। ए किरीट दसकंधर केरे। आवत बालितनय के प्रेरे।। भावार्थ: यह प्रसंग रामचरितमानस के लंका काण्ड का अत्यन्त ओजस्वी और शिक्षाप्रद प्रसंग है। यहाँ रावण की सभा में श्रीराम की निंदा होने पर अंगद जी का क्रोध, पराक्रम और रामभक्ति एक साथ प्रकट होते हैं। 1. रावण की निंदा और अंगद का क्रोध रावण अहंकार में चूर होकर जब श्रीराम की निंदा करता है, तब अंगद जी यह सहन नहीं कर पाते। रामभक्त के लिए प्रभु का अपमान अपने प्राणों से भी अधिक असह्य होता है। तुलसीदास जी कहते हैं — “हरि हर निंदा स...

लंका काण्ड दोहा (32)

 लंका काण्ड दोहा 32 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0-अगुन अमान जानि तेहि दीन्ह पिता बनबास। सो दुख अरु जुबती बिरह पुनि निसि दिन मम त्रास।।31(क)।। जिन्ह के बल कर गर्ब तोहि अइसे मनुज अनेक। खाहीं निसाचर दिवस निसि मूढ़ समुझु तजि टेक।।31(ख)।।  भावार्थ : अगुन अमान जानि तेहि दीन्ह पिता बनबास → रावण कहता है कि दशरथ ने श्रीराम को निर्गुण और तुच्छ समझकर उन्हें वनवास दे दिया। सो दुख अरु जुबती बिरह… →  राम को वह दुख और पत्नी-वियोग सहना पड़ा और रावण का दिन-रात भय बना रहा। जिन्ह के बल कर गर्ब तोहि… → जिन मनुष्यों (राम-लक्ष्मण-वानर) के बल पर तुम गर्व कर रहे हो, ऐसे मनुष्य तो राक्षस दिन-रात खाते हैं। सार: इस दोहे में रावण का अहंकार और अज्ञान दिखाया गया है—वह दशरथ के निर्णय को भी गलत समझता है और श्रीराम को साधारण मनुष्य मानकर उनका अपमान करता है। यही उसका विनाशकारी भ्रम है। विशेष: तुलसीदास जी इस दोहे के माध्यम से यह शिक्षा देते हैं कि अहंकार और बल का घमंड अंततः विनाश का कारण बनता है। रावण अपनी शक्ति के नशे में सत्य को नकार रहा है और इसी कारण विनाश की ओर बढ़ रहा है। दूसरी ओर, श्रीराम की शक...

लंका काण्ड चौपाई (271-278)

 लंका काण्ड चौपाई (271-278) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: जौ अस करौं तदपि न बड़ाई। मुएहि बधें नहिं कछु मनुसाई।। कौल कामबस कृपिन बिमूढ़ा। अति दरिद्र अजसी अति बूढ़ा।। सदा रोगबस संतत क्रोधी। बिष्नु बिमूख श्रुति संत बिरोधी।। तनु पोषक निंदक अघ खानी। जीवन सव सम चौदह प्रानी।। अस बिचारि खल बधउँ न तोही। अब जनि रिस उपजावसि मोही।। सुनि सकोप कह निसिचर नाथा। अधर दसन दसि मीजत हाथा।। रे कपि अधम मरन अब चहसी। छोटे बदन बात बड़ि कहसी।। कटु जल्पसि जड़ कपि बल जाकें। बल प्रताप बुधि तेज न ताकें।। भावार्थ अंगद रावण से कहते हैं— यदि ऐसे नीच व्यक्ति का वध भी कर दिया जाए, तो उसमें कोई बड़ाई नहीं, क्योंकि ऐसे लोगों को मारने से मनुष्यता का यश नहीं बढ़ता। जो कामवासना में डूबा, कृपण, मूर्ख, अत्यंत दरिद्र (गुणों में), अपयशी और बुद्धि से बूढ़ा हो; जो सदा रोगग्रस्त, क्रोधी, विष्णु-विमुख, वेद-संतों का विरोधी हो; जो केवल शरीर का पोषण करे, दूसरों की निंदा करे, पापों की खान हो—ऐसा जीवन तो पशु समान है। इसी विचार से मैं तुझे नहीं मार रहा; अब तू मुझे क्रोधित मत कर। यह सुनकर रावण क्रोध से भर उठता है—दाँत पीसता, होंठ दबाता, हा...

लंका काण्ड दोहा (31)

 लंका काण्ड दोहा 31 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0-तोहि पटकि महि सेन हति चौपट करि तव गाउँ। तव जुबतिन्ह समेत सठ जनकसुतहि लै जाउँ।।30।। भावार्थ अंगद रावण को ललकारते हुए कहता है—मैं तुम्हें धरती पर पटक दूँगा, तुम्हारी पूरी सेना का नाश कर दूँगा और तुम्हारी नगरी को उजाड़ दूँगा। हे मूर्ख! तुम्हारी स्त्रियों सहित जनकनंदिनी सीता को बलपूर्वक ले जाकर राम के पास पहुँचा दूँगा। विस्तृत विवेचन यह दोहा लंका काण्ड में अंगद द्वारा रावण को दी गई कठोर चेतावनी का प्रतीक है। अंगद यहाँ अपने बल, आत्मविश्वास और राम-भक्ति का परिचय देते हुए रावण के अहंकार को चुनौती देता है। “तोहि पटकि महि” कहकर वह यह स्पष्ट करता है कि रावण का शारीरिक बल और उसका घमंड रामभक्तों के सामने कुछ भी नहीं है। “सेन हति चौपट” से यह संकेत मिलता है कि रावण की विशाल सेना भी राम की शक्ति और नीति के आगे टिक नहीं सकती। “तव गाउँ” को उजाड़ने की बात रावण की समृद्ध और अभिमानपूर्ण लंका के विनाश का पूर्व संकेत है। अंतिम पंक्ति में “जनकसुतहि लै जाउँ” कहकर अंगद सीता के उद्धार का दृढ़ संकल्प व्यक्त करता है, जिससे स्पष्ट होता है कि सीता का अपहरण...

लंका काण्ड चौपाई (263-270)

 लंका काण्ड चौपाई 263-270 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: अब जनि बतबढ़ाव खल करही। सुनु मम बचन मान परिहरही।। दसमुख मैं न बसीठीं आयउँ। अस बिचारि रघुबीष पठायउँ।। बार बार अस कहइ कृपाला। नहिं गजारि जसु बधें सृकाला।। मन महुँ समुझि बचन प्रभु केरे। सहेउँ कठोर बचन सठ तेरे।। नाहिं त करि मुख भंजन तोरा। लै जातेउँ सीतहि बरजोरा।। जानेउँ तव बल अधम सुरारी। सूनें हरि आनिहि परनारी।। तैं निसिचर पति गर्ब बहूता। मैं रघुपति सेवक कर दूता।। जौं न राम अपमानहि डरउँ। तोहि देखत अस कौतुक करऊँ।। भावार्थ: अंगद रावण से कहता है—हे दुष्ट! अब व्यर्थ की डींग मत हाँक, मेरी बात सुन और अपना अभिमान छोड़। मैं स्वयं दूत बनकर नहीं आया हूँ, बल्कि यह सोचकर आया हूँ कि रघुकुल-श्रेष्ठ श्रीराम ने मुझे भेजा है। करुणामय श्रीराम ने बार-बार समझाया है कि बिना कारण किसी का वध नहीं होता। मैंने मन में प्रभु की आज्ञा समझकर तेरे कठोर वचनों को सह लिया। नहीं तो अभी तेरा मुख तोड़कर सीता को बलपूर्वक ले जा सकता था। तेरे बल को मैं जानता हूँ, अधम! तू दूसरों की स्त्रियों को हर लाने में ही वीरता समझता है। तू राक्षसों का राजा है, तुझे बहुत गर्व है; औ...

लंका काण्ड दोहा (30)

 लंका काण्ड दोहा 30 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0-जरहिं पतंग मोह बस भार बहहिं खर बृंद। ते नहिं सूर कहावहिं समुझि देखु मतिमंद।।29।। भावार्थ : जो लोग मोह के वश में पड़कर पतंगे की तरह आग में जल जाते हैं और गधे जैसे भारी बोझ ढोते रहते हैं, वे कभी भी वीर (सूर) नहीं कहलाते। हे मूर्ख! समझकर देख—सच्चा पराक्रम विवेक से होता है, अंधे आवेश से नहीं। विस्तृत विवेचन यह दोहा अंगद द्वारा रावण को समझाने के प्रसंग में आता है। अंगद यहाँ रावण के अहंकार और अविवेकपूर्ण साहस पर करारा व्यंग्य करते हैं। ‘पतंग’ का दृष्टांत – पतंगा प्रकाश के मोह में आग के पास जाता है और जलकर नष्ट हो जाता है। इसी प्रकार जो व्यक्ति मोह, अहंकार या कामना में अंधा होकर विनाशकारी मार्ग चुनता है, उसका अंत भी पतंगे जैसा होता है। यह साहस नहीं, मूर्खता है। ‘खर बृंद’ (गधों का झुंड) – गधा भारी बोझ ढोता है, पर उसमें न विवेक होता है न स्वतंत्र निर्णय। अंगद कहते हैं कि जो लोग बिना सोचे-समझे दूसरों के बोझ (अहं, आदेश, दुष्कर्म) ढोते रहते हैं, वे वीर नहीं कहलाते। सूर की परिभाषा – सच्चा वीर वही है जिसमें बल के साथ बुद्धि, पराक्रम के साथ ...

लंका काण्ड चौपाई (253-262)

 लंका काण्ड चौपाई (253-262) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: जरत बिलोकेउँ जबहिं कपाला। बिधि के लिखे अंक निज भाला।। नर कें कर आपन बध बाँची। हसेउँ जानि बिधि गिरा असाँची।। सोउ मन समुझि त्रास नहिं मोरें। लिखा बिरंचि जरठ मति भोरें।। आन बीर बल सठ मम आगें। पुनि पुनि कहसि लाज पति त्यागे।। कह अंगद सलज्ज जग माहीं। रावन तोहि समान कोउ नाहीं।। लाजवंत तव सहज सुभाऊ। निज मुख निज गुन कहसि न काऊ।। सिर अरु सैल कथा चित रही। ताते बार बीस तैं कही।। सो भुजबल राखेउ उर घाली। जीतेहु सहसबाहु बलि बाली।। सुनु मतिमंद देहि अब पूरा। काटें सीस कि होइअ सूरा।। इंद्रजालि कहु कहिअ न बीरा। काटइ निज कर सकल सरीरा।। भावार्थ (सरल अर्थ) अंगद कहते हैं— “जब मैंने देखा कि विधि ने तुम्हारे माथे पर मृत्यु का लेख लिख दिया है, तभी समझ गया कि अब तुम्हारा अंत निश्चित है। मनुष्य अपने ही कर्मों से अपना विनाश लिखता है। यह जानकर मैं हँसा कि विधि की वाणी कभी असत्य नहीं होती। मैंने मन में सोच लिया कि अब मुझे किसी प्रकार का भय नहीं है, क्योंकि ब्रह्मा ने तुम्हारे लिए जो भाग्य लिखा है, वह मूर्खतापूर्ण और अटल है। फिर भी तुम बार-बार अपने बल और...

लंका काण्ड दोहा (29)

 लंका काण्ड दोहा 29 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0-सूर कवन रावन सरिस स्वकर काटि जेहिं सीस। हुने अनल अति हरष बहु बार साखि गौरीस।।28।। भावार्थ रावण अपनी बड़ाई करते हुए कहता है कि उसके जैसा वीर कौन है, जिसने अपने ही हाथ से अपना सिर काटकर शिव को अर्पित किया। उस समय शिव अत्यंत प्रसन्न हुए; इस घटना के साक्षी स्वयं गौरीपति (भगवान शिव) हैं। विस्तृत विवेचन यह दोहा रावण के तप, साहस और शिवभक्ति को रेखांकित करता है। रावण अपनी ही शक्ति और महिमा स्मरण कराता है कि उसने शिव को प्रसन्न करने के लिए अत्यंत कठोर तप किया—यहाँ तक कि स्वहस्त से सिर काटकर आहुति दी। इससे रावण का अदम्य पराक्रम, त्याग और तपोबल प्रकट होता है। शिव का “अति हरष” होना बताता है कि रावण की भक्ति सच्ची और असाधारण थी, और शिव स्वयं उसके साक्षी हैं। परोक्ष संदेश यह है कि इतनी महान भक्ति और शक्ति के होते हुए भी यदि अहंकार और अधर्म का मार्ग अपनाया जाए, तो विनाश अवश्यंभावी है। अंगद रावण को चेताते हैं कि अपनी इसी महिमा को याद कर विवेक से काम ले। सार: रावण की भक्ति महान थी, पर अहंकार ने उसे धर्म से विचलित किया—यही इस दोहे की शिक्षा है।...