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Showing posts from November, 2025

लंका काण्ड दोहा (13)

 लंका काण्ड दोहा 13 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0-कह हनुमंत सुनहु प्रभु ससि तुम्हारा प्रिय दास। तव मूरति बिधु उर बसति सोइ स्यामता अभास।।12(क)।। पवन तनय के बचन सुनि बिहँसे रामु सुजान। दच्छिन दिसि अवलोकि प्रभु बोले कृपा निधान।।12(ख)।। दोहा ॥ कह हनुमंत सुनहु प्रभु ससि तुम्हारा प्रिय दास। तव मूरति बिधु उर बसति सोइ स्यामता अभास।। 12(क)॥ भावार्थ : हनुमानजी प्रभु श्रीराम से कहते हैं— हे प्रभु! सुनिए, चंद्रमा आपका अत्यन्त प्रिय दास है। उसके हृदय में जो  आपका कोमल एवं शांत स्वरूप विद्यमान है, वही श्यामलता का आभास हो रहा है। आपकी कृपा से ही उसके मन में यह सौम्यता, शीतलता और विनम्रता की आभा है। अर्थात—भक्त का हृदय प्रभु का घर होता है और प्रभु का हृदय भक्त का। यह प्रेम और भक्ति का सुंदर आदान-प्रदान है। पवन तनय के बचन सुनि बिहँसे रामु सुजान। दच्छिन दिसि अवलोकि प्रभु बोले कृपा निधान।। 12(ख)॥ भावार्थ : हनुमानजी की प्रेम और विनयपूर्ण वाणी सुनकर श्रीराम मुस्कुराए। वह दक्षिण दिशा की ओर देखते हुए अत्यन्त प्रेमभाव से बोले, क्योंकि दक्षिण दिशा का संबंध यम (न्याय), त्याग और धर्म से है—और हनुम...

लंका काण्ड चौपाई में (100-109)

 लंका काण्ड चौपाई 100--109 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: चौपाई पूरब दिसि गिरिगुहा निवासी। परम प्रताप तेज बल रासी।। मत्त नाग तम कुंभ बिदारी। ससि केसरी गगन बन चारी।। बिथुरे नभ मुकुताहल तारा। निसि सुंदरी केर सिंगारा।। कह प्रभु ससि महुँ मेचकताई। कहहु काह निज निज मति भाई।। कह सुग़ीव सुनहु रघुराई। ससि महुँ प्रगट भूमि कै झाँई।। मारेउ राहु ससिहि कह कोई। उर महँ परी स्यामता सोई।। कोउ कह जब बिधि रति मुख कीन्हा। सार भाग ससि कर हरि लीन्हा।। छिद्र सो प्रगट इंदु उर माहीं। तेहि मग देखिअ नभ परिछाहीं।। प्रभु कह गरल बंधु ससि केरा। अति प्रिय निज उर दीन्ह बसेरा।। बिष संजुत कर निकर पसारी। जारत बिरहवंत नर नारी।। भावार्थ राम जी  रात के समय शिविर में बैठे हैं और रात का दृश्य वर्णित है। पूर्व दिशा के पर्वत-गुफाओं में रहने वाले सिंह आकाश में दौड़ते चंद्रमा को देखकर गर्जन कर रहे हैं। उनका गर्जन ऐसा है जैसे मदमस्त हाथियों के मस्तक फाड़ देने की शक्ति हो। आकाश में तारे डरे-सहमे से दौड़ते प्रतीत होते हैं, मानो रात्रि की सुंदरियाँ अपने सिंगार में व्यस्त हों। उसी समय चंद्रमा के मध्य में काला दाग दिखाई देता है...

लंका काण्ड दोहा (12)

 लंका काण्ड दोहा 12 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0-एहि बिधि कृपा रूप गुन धाम रामु आसीन। धन्य ते नर एहिं ध्यान जे रहत सदा लयलीन।।11(क)।। पूरब दिसा बिलोकि प्रभु देखा उदित मंयक। कहत सबहि देखहु ससिहि मृगपति सरिस असंक।।11(ख)।।  (क) और (ख) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन दोहा 11(क) एहि बिधि कृपा रूप गुन धाम रामु आसीन। धन्य ते नर एहिं ध्यान जे रहत सदा लयलीन।। भावार्थ : भगवान श्रीराम कृपा और गुणों के सागर रूप में सिंहासन पर विराजमान हैं। वे मन, वचन और कर्म से भक्तों पर अनंत दया करते हैं। जो मनुष्य सतत् प्रेम से ऐसे राम के ध्यान में लगे रहते हैं, वे धन्य हैं, उनका जीवन सफल है। विस्तृत विवेचन इस दोहे में तुलसीदास जी भक्ति-मार्ग की महिमा को प्रकट करते हैं। श्रीराम कृपा के स्वरूप हैं, उनका हर गुण भक्त की रक्षा और कल्याण के लिए है। भक्त यदि तन-मन से प्रभु का ध्यान करता है, तो वह संसार के बंधनों से मुक्त हो जाता है। भक्ति केवल पूजा नहीं, बल्कि निरंतर स्मरण और प्रेम से आत्मा का जुड़ जाना है। ऐसे व्यक्ति वास्तव में संसार में सबसे धन्य और पावन कहलाते हैं, क्योंकि उसका जीवन ईश्वर-केंद्रित ह...

लंका काण्ड चौपाई (92-99)

 लंका काण्ड चौपाई 92-99 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: चौपाई इहाँ सुबेल सैल रघुबीरा। उतरे सेन सहित अति भीरा।। सिखर एक उतंग अति देखी। परम रम्य सम सुभ्र बिसेषी।। तहँ तरु किसलय सुमन सुहाए। लछिमन रचि निज हाथ डसाए।। ता पर रूचिर मृदुल मृगछाला। तेहीं आसान आसीन कृपाला।। प्रभु कृत सीस कपीस उछंगा। बाम दहिन दिसि चाप निषंगा।। दुहुँ कर कमल सुधारत बाना। कह लंकेस मंत्र लगि काना।। बड़भागी अंगद हनुमाना। चरन कमल चापत बिधि नाना।। प्रभु पाछें लछिमन बीरासन। कटि निषंग कर बान सरासन।। भावार्थ जब भगवान श्रीराम लंका पर आक्रमण हेतु सेना सहित आगे बढ़ते हैं, तब वे सुबेल पर्वत पर डेरा डालते हैं। सेना अत्यन्त वीर और उत्साहित थी। पर्वत पर एक अत्यन्त सुंदर, ऊँचा और रमणीय शिखर था—सफेद, उज्ज्वल और मनोहारी। उसी स्थान पर लक्ष्मणजी ने अपने हाथों से पत्तों और फूलों द्वारा एक आसन (डसौना) तैयार किया, उस पर मुलायम मृगछाला बिछाई गई। उस पर भगवान राम कृपा करके विराजमान हुए। प्रभु के पास कपीश सुग्रीव सिर झुकाकर खड़े हुए थे। रामजी के दोनों ओर धनुष और तरकश रखे थे। भगवान दोनों हाथों से बाणों को सँवार रहे थे और लंकेश रावण की मंत्र...

लंका काण्ड दोहा (11)

 लंका काण्ड दोहा 11 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0-सुनासीर सत सरिस सो संतत करइ बिलास। परम प्रबल रिपु सीस पर तद्यपि सोच न त्रास।।10।। शब्दार्थ सुनासीर – निरंतर  सत सरिस – सैकड़ों इंद्र के समान  संतत करइ बिलास – सदा भोग विलास में मग्न रहता है परम प्रबल रिपु – अत्यंत शक्तिशाली शत्रु सीस पर – सिर पर, अर्थात् संकट सामने खड़ा है सोच न त्रास – न कोई चिंता, न भय भावार्थ निरंतर सैकड़ो इंद्र के समान रावण भोग विलास में डूबा हुआ है उनके सिर पर अत्यंत प्रबल और बलवान शत्रु राम जैसा बड़ा संकट उपस्थित है, फिर भी वे न तो चिंता करते हैं और न ही भयभीत होते है।  

लंका काण्ड चौपाई (83-91)

 लंका काण्ड चौपाई 83-91 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: चौपाई: यह मत जौं मानहु प्रभु मोरा। उभय प्रकार सुजसु जग तोरा।। सुत सन कह दसकंठ रिसाई। असि मति सठ केहिं तोहि सिखाई।। अबहीं ते उर संसय होई। बेनुमूल सुत भयहु घमोई।। सुनि पितु गिरा परुष अति घोरा। चला भवन कहि बचन कठोरा।। हित मत तोहि न लागत कैसें। काल बिबस कहुँ भेषज जैसें।। संध्या समय जानि दससीसा। भवन चलेउ निरखत भुज बीसा।। लंका सिखर उपर आगारा। अति बिचित्र तहँ होइ अखारा।। बैठ जाइ तेही मंदिर रावन। लागे किंनर गुन गन गावन।। बाजहिं ताल पखाउज बीना। नृत्य करहिं अपछरा प्रबीना।। विस्तृत विवेचन – लंका काण्ड (अध्याय: प्रहस्त और रावण के पुत्र द्वारा रावण को समझाने की कोशिश) दिए गए चौपाई-श्लोक उस प्रसंग के है जब प्रहस्त और रावण के पुत्र ने रावण को समझाया कि श्रीराम से बैर छोड़कर माता सीता को लौटा दें, पर रावण अहंकार में भरकर उसका का अपमान करता है। मूलपाठ एवं भावार्थ यह मत जौं मानहु प्रभु मोरा। उभय प्रकार सुजसु जग तोरा।। अर्थ: यदि तुम मेरी बात नहीं मानते, तो भी तुम्हारे शौर्य और कीर्ति की प्रशंसा जगत में होती है—दोनों प्रकार से तुम्हारी शोभा ही हो...

लंका काण्ड दोहा (10)

लंका काण्ड दोहा 10 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0-नारि पाइ फिरि जाहिं जौं तौ न बढ़ाइअ रारि। नाहिं त सन्मुख समर महि तात करिअ हठि मारि।।9।। भावार्थ (सार) प्रहस्त कह रहा है:अगर प्रतिपक्ष (यहाँ संदर्भ में — सीता को लेकर) वापस लौट जाएँ तो फिजूल का झगड़ा बढ़ाने की जरूरत नहीं। परन्तु अगर वे लौटने की नीयत ही न रखें, तो तब खुले युद्ध में दृढ़ता और कठोरता से उन्हें हराइए — कोई नरमी मत दिखाइए। (संदर्भ: लंका-काण्ड के वार्तालाप/सलाह-संदर्भ)।  विस्तृत विवेचन — क्या कहा जा रहा है और क्यों महत्वपूर्ण है 1. परिस्थिति का निर्णयात्मक सुझाव: दोहे में एक स्पष्ट विकल्प रखा गया है — शांति (यदि विरोधी पलटे) या युद्ध (यदि नहीं पलटे)। यह नीति-निर्देशक (statesmanlike) सलाह है: पहले सामरिक समाधान की कोशिश करो, अगर वह संभव नहीं तो पुरा युद्ध करो।  2. भाषा और लहजा: शब्द जैसे नारि पाइ फिरि जाहिं सीधे-सीधे घटना (सीता प्राप्ति/वापसी) पर निर्भरता दिखाते हैं। न बढ़ाइअ रारि — ‘रारि’ = वैर/विरोध; यहाँ अनावश्यक वैर बढ़ाने की निंदा है। सन्मुख समर महि तात करिअ हठि मारि — सशक्ति, दृढ, और कठोर कार्रवाई का आदेश; ता...

लंका काण्ड चौपाई (73-82)

 लंका काण्ड चौपाई 73-82 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:  चौपाई: कहहिं सचिव सठ ठकुरसोहाती। नाथ न पूर आव एहि भाँती।। बारिधि नाघि एक कपि आवा। तासु चरित मन महुँ सबु गावा।। छुधा न रही तुम्हहि तब काहू। जारत नगरु कस न धरि खाहू।। सुनत नीक आगें दुख पावा। सचिवन अस मत प्रभुहि सुनावा।। जेहिं बारीस बँधायउ हेला। उतरेउ सेन समेत सुबेला।। सो भनु मनुज खाब हम भाई। बचन कहहिं सब गाल फुलाई।। तात बचन मम सुनु अति आदर। जनि मन गुनहु मोहि करि कादर।। प्रिय बानी जे सुनहिं जे कहहीं। ऐसे नर निकाय जग अहहीं।। बचन परम हित सुनत कठोरे। सुनहिं जे कहहिं ते नर प्रभु थोरे।। प्रथम बसीठ पठउ सुनु नीती। सीता देइ करहु पुनि प्रीती।। भावार्थ : इस चौपाई में प्रहस्त रावण को समझाने की कोशिश कर रहा है। श्रीराम के बारे में अपने मंत्रियों से चर्चा कर रहा है। कुछ मूर्ख मंत्री रावण की झूठी प्रशंसा करते हैं और राम को हल्का दिखाने की कोशिश करते हैं। प्रहस्त कहते हैं—यदि एक वानर समुद्र पार करके आ सकता है और लंका को जला सकता है, तो उसे पहले ही पकड़कर क्यों नहीं खा लिया? ऐसा कहकर वे राम की महिमा को बताते हैं।  प्रहस्वत रावण को...

लंका काण्ड दोहा (9)

 लंका काण्ड दोहा 9 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0-सब के बचन श्रवन सुनि कह प्रहस्त कर जोरि। निति बिरोध न करिअ प्रभु मत्रिंन्ह मति अति थोरि।।8।। भावार्थ (सरल भाषा में) प्रहस्त (रावण का प्रमुख मंत्री और सेनापति) हाथ जोड़कर कहता है— “हे प्रभु! आपने सबकी बात सुन ली। लेकिन इन मंत्रियों की बुद्धि बहुत छोटी है। इनकी बात मानकर नीति–विरोध का कार्य मत कीजिए।” अर्थात प्रहस्त रावण को समझाता है कि बाकी मंत्री डरकर या मूर्खतावश गलत सलाह दे रहे हैं। नीति-संगत और दूरदर्शी निर्णय लेना ही उचित है। विस्तृत विवेचन 1. प्रसंग यह प्रसंग लंका काण्ड का है। मंदोदरी के समझाने के बाद रावण राक्षस मंत्रियों की सभा बुलाते हैं। सभी मंत्री अपनी–अपनी सलाह देते हैं। अधिकांश मंत्री घबराकर युद्ध से बचने या गलत राय देने लगते हैं। तब प्रहस्त समझदारी की सलाह देता है। 2. “सब के बचन श्रवन सुनि” – सभी की राय सुनने के बाद रावण ने सभी मंत्रियों की बात ध्यान से सुनी। तुलसीदास जी यह दिखाते हैं कि सुनना राजा का कर्तव्य है, परंतु सही निर्णय समझदारी से ही लिया जाता है। सुनना और मान लेना दोनों अलग बातें हैं। 3. “कह प्रहस्त कर ज...

लंका काण्ड चौपाई (64-72)

 लंका काण्ड चौपाई 64-72 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: तब रावन मयसुता उठाई। कहै लाग खल निज प्रभुताई।। सुनु तै प्रिया बृथा भय माना। जग जोधा को मोहि समाना।। बरुन कुबेर पवन जम काला। भुज बल जितेउँ सकल दिगपाला।। देव दनुज नर सब बस मोरें। कवन हेतु उपजा भय तोरें।। नाना बिधि तेहि कहेसि बुझाई। सभाँ बहोरि बैठ सो जाई।। मंदोदरीं हदयँ अस जाना। काल बस्य उपजा अभिमाना।। सभाँ आइ मंत्रिन्ह तेंहि बूझा। करब कवन बिधि रिपु सैं जूझा।। कहहिं सचिव सुनु निसिचर नाहा। बार बार प्रभु पूछहु काहा।। कहहु कवन भय करिअ बिचारा। नर कपि भालु अहार हमारा।। भावार्थ : रावण माया की पुत्री (मयसुता) को उठाकर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करता है और घमंड से कहता है कि तुम व्यर्थ ही डर रही हो। संसार का कोई योद्धा मेरे समान नहीं है। मैंने अपने भुजबल से वरुण, कुबेर, पवन, यम और काल तक को जीत लिया है। देवता, दानव और मनुष्य — सब मेरे वश में हैं, फिर तुम किस कारण डर रही हो? मंदोदरी समझ जाती है कि रावण का यह अभिमान काल-प्रेरित है। सभा में जाकर रावण मंत्रियों से पूछता है कि शत्रु राम से युद्ध किस प्रकार किया जाए। मंत्री बार-बार वही बात कहते है...

लंका काण्ड दोहा (8)

 लंका काण्ड दोहा 8 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दोहा – दो० – अस कहि नयन नीर भरि गहि पद कंपित गात। नाथ भजहु रघुनाथहि अचल होइ अहिवात।। 7 ।। भावार्थ : मंदोदरी विनीत भाव से रावण को समझाती है कि “हे नाथ! श्रीराम का भजन करिए, वही सबका कल्याण करने वाले हैं।” यह कहकर उनके नेत्रों में आँसू भर आते हैं, शरीर काँपने लगता है और वे रावण के चरण पकड़कर विनती करती है कि “हे स्वामी! प्रभु राम का भजन करें, यही आपका स्थिर और शुभ कल्याणकारी आशीर्वाद होगा। विस्तृत विवेचन : इस प्रसंग में मंदोदरी अपने पति रावण को अंतिम बार धर्म और सत्य का मार्ग अपनाने की सलाह देती है। वह जानते हैं कि रावण अत्यंत अहंकारी है, परंतु फिर भी पत्नी धर्म निभाते हुए उसे सत्य मार्ग पर लाना चाहती है। 1. "अस कहि नयन नीर भरि" मंदोदरी की आँखें भर आती हैं। क्योंकि - वे रावण के पतन को सामने देख रही है। उन्हें पता है कि अहंकार का परिणाम विनाश ही होता है। फिर भी पत्नी होने के नाते उसके मन में करूणा है। उनकी आँसू बताती हैं कि सच्चा शुभचिंतक वही है, जो कठोर समय में भी सही सलाह देता है। 2. "गहि पद कंपित गात" मंदोदरी रावण क...

लंका काण्ड चौपाई (56-63)

 लंका काण्ड चौपाई 56-63 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: चौपाई: नाथ दीनदयाल रघुराई। बाघउ सनमुख गएँ न खाई।। चाहिअ करन सो सब करि बीते। तुम्ह सुर असुर चराचर जीते।। संत कहहिं असि नीति दसानन। चौथेंपन जाइहि नृप कानन।। तासु भजन कीजिअ तहँ भर्ता। जो कर्ता पालक संहर्ता।। सोइ रघुवीर प्रनत अनुरागी। भजहु नाथ ममता सब त्यागी।। मुनिबर जतनु करहिं जेहि लागी। भूप राजु तजि होहिं बिरागी।। सोइ कोसलधीस रघुराया। आयउ करन तोहि पर दाया।। जौं पिय मानहु मोर सिखावन। सुजसु होइ तिहुँ पुर अति पावन।।  भावार्थ : मंदोदरी रावण को समझाते हुए कहती हैं— हे प्रभु! श्रीराम दीनों पर दया करने वाले हैं। सिंह तो सामने आए बाघ को भी नहीं खाता—इसी प्रकार श्रीराम किसी भी शरणागत को कभी नहीं त्यागते। तुम जो करना चाहते हो, सब कर चुके, अब कोई उपाय शेष नहीं। देव, दानव, मनुष्य—सब पर श्रीराम की विजय है। संतों की नीति है कि जो व्यक्ति दुष्टता न छोड़े, उसका चौथा पन (अधम अवस्था) जंगल में समाप्त होता है अर्थात नाश हो जाता है। इसलिए आप उस प्रभु का भजन करें, जो जगत का रचयिता, पालक और संहारकर्ता है (ब्रह्म, विष्णु, महेश रूप)। वही रघुवीर भक्...

लंका काण्ड दोहा (7)

 लंका काण्ड दोहा 7 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0-रामहि सौपि जानकी नाइ कमल पद माथ। सुत कहुँ राज समर्पि बन जाइ भजिअ रघुनाथ।।6।। भावार्थ राम के चरणकमलों में सिर झुकाकर जानकी (सीता) को समर्पित कर दो; और अपना पुत्र को राज्य समर्पित कर स्वयं वन/बिरह में चले जाओ और रघुनाथ (राम) का भजन करो। विस्तृत विवेचन 1. प्रसंग — यह दोह लंका काण्ड का है जहां मंदोदरी रावण को समझाने का प्रयास करती है। 2. अर्थ-निर्देश (हर शब्द का भाव) रामहि सौपि जानकी — जानकी (सीता) को राम के पास सौंप देना (अर्थात् जिन संबंधों/वस्तुओं का समर्पण ईश्वर को करना चाहिए, उन्हें कर देना)। नाइ कमल पद माथ — चरणकमलों में सिर नमन कर (आस्था और समर्पण का पूर्ण चिह्न)। यहाँ “कमल पद” ईश के पवित्र चरणों का रूपक है। सुत कहुँ राज समर्पि — पुत्र को (या परिजन/उत्तराधिकारी को) राज्य सौंप देना; यानी सांसारिक उत्तरदायित्व अवतरित कर देना। बन जाइ भजिअ रघुनाथ — स्वयं वनवासी बनकर (संन्यासी/विरागी होकर) रघुनाथ का भजन- ध्यान करना — पूर्ण निष्ठा से ईश्वर-भक्ति में मग्न होना। 3. सांस्कृतिक/नैतिक संदेश यह दोहा वैराग्य व समर्पण का उपदेश देता है: जी...

लंका काण्ड चौपाई (47-55)

 लंका काण्ड चौपाई 47-55 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:  चौपाई: निजबिकलता बिचारि बहोरी। बिहँसि गयउ ग्रह करि भय भोरी।। मंदोदरीं सुन्यो प्रभु आयो। कौतुकहीं पाथोधि बँधायो।। कर गहि पतिहि भवन निज आनी। बोली परम मनोहर बानी।। चरन नाइ सिरु अंचलु रोपा। सुनहु बचन पिय परिहरि कोपा।। नाथ बयरु कीजे ताही सों। बुधि बल सकिअ जीति जाही सों।। तुम्हहि रघुपतिहि अंतर कैसा। खलु खद्योत दिनकरहि जैसा।। अतिबल मधु कैटभ जेहिं मारे। महाबीर दितिसुत संघारे।। जेहिं बलि बाँधि सहजभुज मारा। सोइ अवतरेउ हरन महि भारा।। तासु बिरोध न कीजिअ नाथा। काल करम जिव जाकें हाथा।। भावार्थ (सरल भाषा में) इस चौपाई में मंदोदरी, जो अत्यंत बुद्धिमती और धर्मशील रानी है, रावण को समझाती है कि वह अपने अभिमान, क्रोध और जिद को छोड़ दे। वह कहती है— राम कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं। वह सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु के अवतार हैं। जिन महाबलियों को दैत्य भी नहीं जीत पाए, उन्हें राम ने खेल-खेल में मार दिया। इसलिए उनसे बैर करना काल को निमंत्रण देने जैसा है। मंदोदरी रावण से निवेदन करती है कि वह अपनी भूल स्वीकार करे, माता सीता को लौटा दे, और राम से व...

लंका काण्ड दोहा (6)

 लंका काण्ड दोहा 6 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0-बांध्यो बननिधि नीरनिधि जलधि सिंधु बारीस। सत्य तोयनिधि कंपति उदधि पयोधि नदीस।।5।। रावण आश्चर्य में पड़ कर समुद्र के दस नाम बननिधि,नीरनिधि,जलधि, सिंधु,बारीस,तोयनिधि,कंपति,उदधि, पयोधि और नदीस का अपने अलग-अलग मुखों से उच्चारण किया। भावार्थ (सरल भाषा में): भगवान राम के आदेश से समुद्र पर बाँध बना दिया गया। यह देखकर सत्य रूप से समुद्र (जल के स्वामी) काँप उठा, क्योंकि उसकी अपार लहरों पर अब वनराशि (वानर सेना) ने विजय पा ली थी। समुद्र स्वयं को असहाय और लज्जित अनुभव कर रहा था। विस्तृत विवेचन: 1. “बांध्यो बननिधि नीरनिधि जलधि सिंधु बारीस।” यहाँ ‘बननिधि’ = वननिधि, ‘नीरनिधि/जलधि/सिंधु’ = समुद्र नल-नील की अगुवाई में वानर सेना ने विशाल समुद्र पर पत्थरों, पर्वतों, वृक्षों को डालकर सेतु बाँध दिया। जिस समुद्र को पार करना असंभव माना जाता था, जिसे देव-दानव भी चुनौती न दे पाए—उसके ऊपर अब साधारण वानरों ने रास्ता बना दिया। यह भगवान राम की शक्ति, प्रेरणा और संकल्प का चमत्कार है। 2. “सत्य तोयनिधि कंपति उदधि पयोधि नदीस।” समुद्र को अनेक नामों से पुकारकर तु...

लंका काण्ड चौपाई (37-46)

 लंका काण्ड चौपाई 37-46 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: अस कौतुक बिलोकि द्वौ भाई। बिहँसि चले कृपाल रघुराई।। सेन सहित उतरे रघुबीरा। कहि न जाइ कपि जूथप भीरा।। सिंधु पार प्रभु डेरा कीन्हा। सकल कपिन्ह कहुँ आयसु दीन्हा।। खाहु जाइ फल मूल सुहाए। सुनत भालु कपि जहँ तहँ धाए।। सब तरु फरे राम हित लागी। रितु अरु कुरितु काल गति त्यागी।। खाहिं मधुर फल बटप हलावहिं। लंका सन्मुख सिखर चलावहिं।। जहँ कहुँ फिरत निसाचर पावहिं। घेरि सकल बहु नाच नचावहिं।। दसनन्हि काटि नासिका काना। कहि प्रभु सुजसु देहिं तब जाना।। जिन्ह कर नासा कान निपाता। तिन्ह रावनहि कही सब बाता।। सुनत श्रवन बारिधि बंधाना। दस मुख बोलि उठा अकुलाना।। भावार्थ (संक्षेप में) बन्दर और भालू के कर्तव्य  देखकर बड़े प्रसन्न हुए। पूरी वानर सेना सहित वे समुद्र पार उतरकर लंका के सामने डेरा डालते हैं। श्रीराम सभी वानरों-भालुओं को फल–मूल खाने का आदेश देते हैं। वानर पेड़ों को झकझोरकर फल खाते और लंका की ओर पर्वत-शिखर उखाड़कर फेंकते हैं। जहाँ-जहाँ राक्षस मिलते, वानर उन्हें पकड़कर नाक-कान काटकर भगा देते। वे घायल राक्षस जाकर रावण को सबकुछ बताते। यह सुन र...

लंका काण्ड दोहा (5)

 लंका काण्ड दोहा 5 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0-सेतुबंध भइ भीर अति कपि नभ पंथ उड़ाहिं। अपर जलचरन्हि ऊपर चढ़ि चढ़ि पारहि जाहिं।।4।। भावार्थ : सेतु बन जाने पर वहाँ बहुत भीड़ हो गई। वानर सेना आकाश मार्ग में उड़ते जा रहे हैं और जलचर (मछलियाँ, कछुए आदि) भी सेतु पर चढ़-चढ़कर समुद्र पार कर रहे हैं। विस्तृत विवेचन इस दोहे में गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामसेतु बनने के बाद की अद्भुत और अद्वितीय स्थिति का वर्णन किया है। १. ‘सेतुबंध भइ भीर अति’ सेतु बनते ही वहाँ अपार भीड़ लग गई। करोड़ों वानर, भालू, सैनिक—सब एकत्र होकर लंका की दिशा में पार करने को उत्सुक थे। समुद्र के ऊपर बना सेतु सबको अत्यंत आकर्षक लगा। यह भीड़ केवल स्थलीय जीवों की ही नहीं थी, बल्कि आकाश में उड़ने वाले देवगण भी इसे देखने के लिए उपस्थित थे। २. ‘कपि नभ पंथ उड़ाहिं’ वानर सेना अपनी शक्ति से आकाश में कूदते, फाँदते, उड़ते हुए लंका की ओर चल रही थी। यह दृश्य उनकी शक्ति, उमंग, उत्साह और युद्ध की आतुरता को दिखाता है। अनेक वानर तो सेतु का प्रयोग ही नहीं कर रहे, वे आकाश मार्ग से ही जा रहे हैं। ३. ‘अपर जलचरन्हि ऊपर चढ़ि चढ़ि पारहि जाहिं’ यह...

लंका काण्ड चौपाई (28-36)

 लंका काण्ड चौपाई 28-36 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:- बाँधि सेतु अति सुदृढ़ बनावा। देखि कृपानिधि के मन भावा।। चली सेन कछु बरनि न जाई। गर्जहिं मर्कट भट समुदाई।। सेतुबंध ढिग चढ़ि रघुराई। चितव कृपाल सिंधु बहुताई।। देखन कहुँ प्रभु करुना कंदा। प्रगट भए सब जलचर बृंदा।। मकर नक्र नाना झष ब्याला। सत जोजन तन परम बिसाला।। अइसेउ एक तिन्हहि जे खाहीं। एकन्ह कें डर तेपि डेराहीं।। प्रभुहि बिलोकहिं टरहिं न टारे। मन हरषित सब भए सुखारे।। तिन्ह की ओट न देखिअ बारी। मगन भए हरि रूप निहारी।। चला कटकु प्रभु आयसु पाई। को कहि सक कपि दल बिपुलाई।। भावार्थ (सरल शब्दों में) वानरों ने सेतु को बहुत मजबूत बाँध दिया, जिसे देखकर करुणा के सागर भगवान राम का मन अत्यन्त प्रसन्न हो उठा। विशाल वानर सेना गर्जना करते हुए आगे बढ़ी। रामचंद्रजी सेतु के पास चढ़कर समुद्र की विशालता देखने लगे। भगवान की करुणा से समुद्र के सभी जलचर (मछलियाँ, मगर, साँप आदि) ऊपर आकर उनके दर्शन करने लगे। कुछ जलचर अत्यन्त विशाल थे, जो सात योजन तक लम्बे थे — कुछ ऐसे थे जो दूसरों को खा जाते थे और कुछ उन्हें देखकर भी भयभीत रहते थे। लेकिन भगवान राम के दर्श...

लंका काण्ड दोहा (4)

 लंका काण्ड दोहा 4 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दोहा – श्री रघुबीर प्रताप ते सिंधु तरे पाषान। ते मतिमंद जे राम तजि भजहिं जाइ प्रभु आन।। (लंका काण्ड, दोहा 3) भावार्थ – श्रीरामचंद्र जी के प्रताप से पत्थर भी समुद्र पार कर गए, अर्थात् निर्जीव वस्तुएँ भी उनके नाम से तैर गईं। ऐसे में जो मूर्ख लोग भगवान श्रीराम को छोड़कर अन्य देवताओं की उपासना करते हैं, वे निश्चय ही अज्ञानी हैं। विस्तृत विवेचन – इस दोहे में तुलसीदासजी ने भगवान श्रीराम के नाम और उनके प्रताप की महिमा का वर्णन किया है। 1. जब सेतुबंध के समय नल-नील पत्थरों पर "राम" नाम लिखते थे, तो वे पत्थर जल में डूबने के बजाय तैर जाते थे। यह घटना यह सिद्ध करती है कि रामनाम में स्वयं भगवान की शक्ति निहित है। 2. कवि कहते हैं — जो लोग इतने प्रत्यक्ष प्रमाण के बाद भी श्रीराम को छोड़कर अन्य देवताओं की आराधना करते हैं, वे मति से मन्द (अर्थात् बुद्धिहीन) हैं। क्योंकि जो भगवान पत्थरों को पार करा सकते हैं, वे ही संसार-सागर से जीवों को पार कराने में समर्थ हैं। निष्कर्ष – यह दोहा राम-भक्ति की सर्वोच्चता को प्रकट करता है। तुलसीदासजी के अनुसार, ...

लंका काण्ड चौपाई (19-27)

 लंका काण्ड चौपाई 19-27 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: चौपाई — जे रामेस्वर दरसनु करिहहिं। ते तनु तजि मम लोक सिधरिहहिं।। जो गंगाजलु आनि चढ़ाइहि। सो साजुज्य मुक्ति नर पाइहि।। होइ अकाम जो छल तजि सेइहि। भगति मोरि तेहि संकर देइहि।। मम कृत सेतु जो दरसनु करिही। सो बिनु श्रम भवसागर तरिही।। राम बचन सब के जिय भाए। मुनिबर निज निज आश्रम आए।। गिरिजा रघुपति कै यह रीती। संतत करहिं प्रनत पर प्रीती।। बाँधा सेतु नील नल नागर। राम कृपाँ जसु भयउ उजागर।। बूड़हिं आनहि बोरहिं जेई। भए उपल बोहित सम तेई।। महिमा यह न जलधि कइ बरनी। पाहन गुन न कपिन्ह कइ करनी।। भावार्थ (सारांश): भगवान श्रीराम कहते हैं कि — जो कोई भी रामेश्वरम का दर्शन करेगा, वह शरीर त्याग के बाद मेरे लोक को प्राप्त होगा। जो व्यक्ति वहाँ गंगाजल लाकर चढ़ाएगा, उसे सायुज्य मुक्ति (भगवान से एकत्व) की प्राप्ति होगी। जो कोई बिना छल-कपट के भगवान शिव की सेवा करेगा, उसे शिवजी भक्ति का वरदान देंगे। और जो मेरे द्वारा निर्मित इस सेतु (रामसेतु) का दर्शन करेगा, वह बिना किसी कठिनाई के संसार-सागर से पार हो जाएगा। इन वचनों से सब मुनि प्रसन्न होकर अपने-अपने आश्रम क...

लंका काण्ड दोहा (3)

 लंका काण्ड दोहा 3 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0-संकर प्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास। ते नर करहि कलप भरि धोर नरक महुँ बास।।2।। भावार्थ: जो शिव से द्रोह रखता है और मेरा भक्त कहलाता है, वह मनुष्य स्वप्न में भी मुझे नहीं पाता। शंकरजी से विमुख होकर (विरोध करके) जो मेरी भक्ति चाहता है, वह नरकगामी, मूर्ख और अल्पबुद्धि है। जिनको शंकरजी प्रिय हैं, परन्तु जो मेरे द्रोही हैं एवं जो शिवजी के द्रोही हैं और मेरे दास (बनना चाहते) हैं, वे मनुष्य कल्पभर घोर नरक में निवास करते हैं । विस्तृत विवेचन: भगवान राम ने अपने और भगवान शिव के बीच भेदभाव रखने वाले को घोर नरक में निवास करने के बारे में कहा है। उन्होंने कहा स्पष्ट कर दिया है कि दोनों के बीच कोई भेद नहीं है और वे एक हीं परब्रह्म के दो स्वरूप हैं।

लंका काण्ड चौपाई (11-18)

 लंका काण्ड चौपाई 11-18 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: सैल बिसाल आनि कपि देहीं। कंदुक इव नल नील ते लेहीं।। देखि सेतु अति सुंदर रचना। बिहसि कृपानिधि बोले बचना।। परम रम्य उत्तम यह धरनी। महिमा अमित जाइ नहिं बरनी।। करिहउँ इहाँ संभु थापना। मोरे हृदयँ परम कलपना।। सुनि कपीस बहु दूत पठाए। मुनिबर सकल बोलि लै आए।। लिंग थापि बिधिवत करि पूजा। सिव समान प्रिय मोहि न दूजा।। सिव द्रोही मम भगत कहावा। सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा।। संकर बिमुख भगति चह मोरी। सो नारकी मूढ़ मति थोरी।। भावार्थ (सरल अर्थ): वानरों ने विशाल पर्वत लाकर नल-नील को दिए, और वे उन पर्वतों को कंदुक (गेंद) की तरह लेकर सेतु बनाते गए। श्रीराम ने जब उस सुंदर और अद्भुत सेतु की रचना देखी, तो वे हँसकर बोले — यह भूमि अत्यंत रमणीय और पवित्र है, जिसकी महिमा का वर्णन करना असंभव है। श्रीराम बोले — “मैं यहाँ भगवान शंकर की स्थापना करूँगा, क्योंकि यह मेरे हृदय की परम अभिलाषा है।” श्रीराम के आदेश से सुग्रीव ने बहुत-से दूत भेजकर सब मुनियों को बुलवाया। फिर श्रीराम ने वहाँ विधिपूर्वक शिवलिंग की स्थापना कर पूजा की। श्रीराम कहते हैं — “शिवजी के समान मुझे...

लंका काण्ड दोहा (2)

 लंका काण्ड दोहा 2 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0-अति उतंग गिरि पादप लीलहिं लेहिं उठाइ। आनि देहिं नल नीलहि रचहिं ते सेतु बनाइ।।1।। भावार्थ : वानर सेना के सभी वीर पर्वतों और बड़े-बड़े वृक्षों को खेल-खेल में (बहुत सहजता से) उखाड़कर लाते हैं और उन्हें नल-नील को सौंप देते हैं। नल और नील उन पर्वतों और वृक्षों को समुद्र में डालकर भगवान श्रीराम के लिए सेतु (पुल) का निर्माण करते हैं विस्तृत विवेचन : यह दोहा लंका काण्ड में उस प्रसंग का वर्णन करता है जब श्रीराम जी के आदेश से वानर सेना समुद्र पर पुल बनाने का कार्य प्रारंभ करती है। भगवान ने नल और नील को यह कार्य सौंपा क्योंकि उन्हें वरदान था कि उनके द्वारा जल में फेंका गया कोई भी पत्थर डूबेगा नहीं। वानरगण बड़े उत्साह से चारों दिशाओं में जाकर विशाल पर्वत, शिखर और वृक्ष उखाड़ लाते हैं। तुलसीदास जी ने यहाँ वानरों की शक्ति और उनकी सेवा भावना का अत्यंत सुंदर चित्रण किया है — वे इस कार्य को “लीला” (खेल) की तरह करते हैं। यह प्रसंग भक्ति और सहयोग की भावना का प्रतीक है। सभी वानर अपने-अपने सामर्थ्य के अनुसार प्रभुकार्य में लगे हैं। इससे यह भी शिक्ष...

लंका काण्ड चौपाई (1-10)

 लंका काण्ड चौपाई 1-10 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: यह लघु जलधि तरत कति बारा। अस सुनि पुनि कह पवनकुमारा।। प्रभु प्रताप बड़वानल भारी। सोषेउ प्रथम पयोनिधि बारी।। तब रिपु नारी रुदन जल धारा। भरेउ बहोरि भयउ तेहिं खारा।। सुनि अति उकुति पवनसुत केरी। हरषे कपि रघुपति तन हेरी।। जामवंत बोले दोउ भाई। नल नीलहि सब कथा सुनाई।। राम प्रताप सुमिरि मन माहीं। करहु सेतु प्रयास कछु नाहीं।। बोलि लिए कपि निकर बहोरी। सकल सुनहु बिनती कछु मोरी।। राम चरन पंकज उर धरहू। कौतुक एक भालु कपि करहू।। धावहु मर्कट बिकट बरूथा। आनहु बिटप गिरिन्ह के जूथा।। सुनि कपि भालु चले करि हूहा। जय रघुबीर प्रताप समूहा।। यह अंश रामचरितमानस के लंका काण्ड से लिया गया है — जहाँ समुद्र पर सेतु निर्माण का प्रसंग वर्णित है। नीचे भावार्थ और विस्तृत विवेचन दिया गया है👇 🌸 चौपाई: यह लघु जलधि तरत कति बारा। अस सुनि पुनि कह पवनकुमारा।। प्रभु प्रताप बड़वानल भारी। सोषेउ प्रथम पयोनिधि बारी।। भावार्थ: हनुमान जी ने कहा — "प्रभु! यह छोटा-सा समुद्र पार करने में क्या देर है! आपके प्रताप से तो मैं अग्नि समान तेज से इसे पहले ही सुखा सकता हूँ।" विवे...

लंका काण्ड सोरठा (1)

 लंका काण्ड सोरठा 1 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन सो0-सिंधु बचन सुनि राम सचिव बोलि प्रभु अस कहेउ। अब बिलंबु केहि काम करहु सेतु उतरै कटकु।। सुनहु भानुकुल केतु जामवंत कर जोरि कह। नाथ नाम तव सेतु नर चढ़ि भव सागर तरिहिं।। भावार्थ: समुद्र देवता के बचन को सुनने के बाद राम जी अपने सचिव से कह रहे हैं कि अब सेना को सेतु पार करने में विलम्ब क्यों हो रहा है। इस पर जामवंत जी कह रहे हैं " हे भानुकुल (सूर्य वंशी राम) आपके नाम का स्मरण मात्र से मनुष्य भवसागर को पार कर जाता है  निष्कर्ष: इस सोरठा में भगवान राम के नाम का महत्व बताया गया है, जिनके लेने मात्र से मनुष्य भवसागर को पार कर जाता है।

लंका काण्ड (दोहा 1)

 लंका काण्ड दोहा 1  का भावार्थ  सहित विस्तृत विवेचन: दो0-लव निमेष परमानु जुग बरष कलप सर चंड। भजसि न मन तेहि राम को कालु जासु कोदंड॥ भावार्थ चाहे वह एक लम्हा (लव, निमेष, परमाणु—बहुत छोटा समय) ही क्यों न हो या युग-वर्ष-कल्प जैसे बहुत बड़े समय तक — यदि मन से तुम राम का स्मरण/भजन नहीं करते, तो उन सभी कालों का कोई मूल्य नहीं। अर्थात् राम का संयोग (एक क्षण भी) न होने पर लंबी आयु/काल का क्या लाभ — भक्ति ही सर्वोच्च है। विस्तृत विवेचन 1. शब्दार्थ (लाइन-बाई-लाइन्): लव, निमेष, परमानु — बहुत-अत्यंत लघु समय के सूचक (लव = एक क्षण; निमेष = पलक झपकना; परमानु = अति सूक्ष्म/एक क्षुद्र इकाई)। जुग, बरष, कलप — बहुत लम्बे काल (युग = बड़ी अवधि; वर्ष = साल; कल्प = ब्रह्म का दिन — असंख्य समय)। सर चंड — यहाँ का अर्थ है अतिशय काल/अत्यधिक संचयी समय (कविता में ‘बहुत-बहुत समय’ का संकेत)। भजसि न मन तेहि राम को — उस अवधि में भी यदि मन से तुम राम की भक्ति/स्मरण नहीं करते। कालु जासु कोदंड — काव्यात्मक रूपक; ‘कोदंड’—राम का धनुष। यहाँ अर्थ यह भी लिया जा सकता है कि मृत्यु-काल या समय के समक्ष (काल के सामने) ...

लंका काण्ड श्लोक (1-3)

 लंका काण्ड श्लोक 1-3 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: श्लोक रामं कामारिसेव्यं भवभयहरणं कालमत्तेभसिंहं योगीन्द्रं ज्ञानगम्यं गुणनिधिमजितं निर्गुणं निर्विकारम्। मायातीतं सुरेशं खलवधनिरतं ब्रह्मवृन्दैकदेवं वन्दे कन्दावदातं सरसिजनयनं देवमुर्वीशरूपम्।।1।। शंखेन्द्वाभमतीवसुन्दरतनुं शार्दूलचर्माम्बरं कालव्यालकरालभूषणधरं गंगाशशांकप्रियम्। काशीशं कलिकल्मषौघशमनं कल्याणकल्पद्रुमं नौमीड्यं गिरिजापतिं गुणनिधिं कन्दर्पहं शङ्करम्।।2।। यो ददाति सतां शम्भुः कैवल्यमपि दुर्लभम्। खलानां दण्डकृद्योऽसौ शङ्करः शं तनोतु मे।।3।। यह श्लोक लंका काण्ड में भगवान शिव की स्तुति के रूप में आता है, जहाँ तुलसीदासजी भगवान राम के लिए शिव की अनन्य भक्ति और उनके स्वरूप का वर्णन करते हैं। अब प्रत्येक श्लोक का भावार्थ व विवेचन— श्लोक 1 रामं कामारिसेव्यं भवभयहरणं कालमत्तेभसिंहं योगीन्द्रं ज्ञानगम्यं गुणनिधिमजितं निर्गुणं निर्विकारम्। मायातीतं सुरेशं खलवधनिरतं ब्रह्मवृन्दैकदेवं वन्दे कन्दावदातं सरसिजनयनं देवमुर्वीशरूपम्।। भावार्थ: मैं उस श्रीराम को नमस्कार करता हूँ — जिन्हें स्वयं कामदेव के शत्रु (शिवजी) भी पूजते हैं, जो स...