लंका काण्ड दोहा (13)
लंका काण्ड दोहा 13 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0-कह हनुमंत सुनहु प्रभु ससि तुम्हारा प्रिय दास। तव मूरति बिधु उर बसति सोइ स्यामता अभास।।12(क)।। पवन तनय के बचन सुनि बिहँसे रामु सुजान। दच्छिन दिसि अवलोकि प्रभु बोले कृपा निधान।।12(ख)।। दोहा ॥ कह हनुमंत सुनहु प्रभु ससि तुम्हारा प्रिय दास। तव मूरति बिधु उर बसति सोइ स्यामता अभास।। 12(क)॥ भावार्थ : हनुमानजी प्रभु श्रीराम से कहते हैं— हे प्रभु! सुनिए, चंद्रमा आपका अत्यन्त प्रिय दास है। उसके हृदय में जो आपका कोमल एवं शांत स्वरूप विद्यमान है, वही श्यामलता का आभास हो रहा है। आपकी कृपा से ही उसके मन में यह सौम्यता, शीतलता और विनम्रता की आभा है। अर्थात—भक्त का हृदय प्रभु का घर होता है और प्रभु का हृदय भक्त का। यह प्रेम और भक्ति का सुंदर आदान-प्रदान है। पवन तनय के बचन सुनि बिहँसे रामु सुजान। दच्छिन दिसि अवलोकि प्रभु बोले कृपा निधान।। 12(ख)॥ भावार्थ : हनुमानजी की प्रेम और विनयपूर्ण वाणी सुनकर श्रीराम मुस्कुराए। वह दक्षिण दिशा की ओर देखते हुए अत्यन्त प्रेमभाव से बोले, क्योंकि दक्षिण दिशा का संबंध यम (न्याय), त्याग और धर्म से है—और हनुम...