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Showing posts from December, 2025

लंका काण्ड चौपाई (245-252)

 लंका काण्ड चौपाई 245-252 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: सठ साखामृग जोरि सहाई। बाँधा सिंधु इहइ प्रभुताई।। नाघहिं खग अनेक बारीसा। सूर न होहिं ते सुनु सब कीसा।। मम भुज सागर बल जल पूरा। जहँ बूड़े बहु सुर नर सूरा।। बीस पयोधि अगाध अपारा। को अस बीर जो पाइहि पारा।। दिगपालन्ह मैं नीर भरावा। भूप सुजस खल मोहि सुनावा।। जौं पै समर सुभट तव नाथा। पुनि पुनि कहसि जासु गुन गाथा।। तौ बसीठ पठवत केहि काजा। रिपु सन प्रीति करत नहिं लाजा।। हरगिरि मथन निरखु मम बाहू। पुनि सठ कपि निज प्रभुहि सराहू।। भावार्थ : रावण कहता है— वानरों जैसे तुच्छ प्राणियों को साथ लेकर समुद्र बाँध देना ही क्या प्रभुता है? पक्षी भी कई बार समुद्र लाँघ जाते हैं, पर वे सूर्य नहीं बन जाते। मेरी भुजाओं में समुद्र जैसा अपार बल है, जिसमें अनेक देवता, मनुष्य और वीर डूब चुके हैं। बीसों समुद्र भी अथाह हैं—पर ऐसा कौन-सा वीर है जो उन्हें पार कर ले? मैंने दिग्पालों से भी जल भरवाया है और राजाओं का यश सुनकर भी मुझे हँसी आती है। यदि तुम्हारे स्वामी (राम) सचमुच महान योद्धा हैं, जिनके गुण तुम बार-बार गाते हो, तो फिर दूत बनाकर भेजने की क्या आवश्यकता ...

लंका काण्ड दोहा (28)

 लंका काण्ड दोहा 28 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0-कुंभकरन अस बंधु मम सुत प्रसिद्ध सक्रारि। मोर पराक्रम नहिं सुनेहि जितेउँ चराचर झारि।।27।। भावार्थ रावण कहता है— कुंभकर्ण जैसा मेरा भाई है और इंद्र का शत्रु कहलाने वाला मेघनाद मेरा पुत्र है। फिर भी तुमने मेरे पराक्रम का नाम तक नहीं सुना? मैंने अपने बल से समस्त चराचर जगत् को जीत लिया है। विस्तृत विवेचन इस दोहे में रावण का घमंड और अहंकार स्पष्ट दिखाई देता है। अंगद के उपदेश और चेतावनी के बाद भी रावण अपनी शक्ति का बखान करता है। वह अपने कुल-पराक्रम का उल्लेख करके सामने वाले को डराना चाहता है। कुंभकर्ण का उल्लेख – कुंभकर्ण रावण का भाई है, जो अत्यंत बलशाली और पराक्रमी माना जाता है। रावण उसे अपनी शक्ति का प्रमाण बताकर यह जताता है कि उसका परिवार ही वीरों से भरा है। मेघनाद (इंद्रजित) का गौरव – “प्रसिद्ध सक्रारि” कहकर रावण अपने पुत्र मेघनाद की वीरता बताता है, जिसने इंद्र को पराजित किया था। इससे रावण अपने वंश की युद्ध-शक्ति को श्रेष्ठ सिद्ध करना चाहता है। अपने पराक्रम का दंभ – रावण कहता है कि उसने चराचर (जड़-चेतन) समस्त जगत् को जीत लिया है।...

लंका काण्ड चौपाई (237-244)

 लंका काण्ड चौपाई 237-244 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: सुनु रावन परिहरि चतुराई। भजसि न कृपासिंधु रघुराई।। जौ खल भएसि राम कर द्रोही। ब्रह्म रुद्र सक राखि न तोही।। मूढ़ बृथा जनि मारसि गाला। राम बयर अस होइहि हाला।। तव सिर निकर कपिन्ह के आगें। परिहहिं धरनि राम सर लागें।। ते तव सिर कंदुक सम नाना। खेलहहिं भालु कीस चौगाना।। जबहिं समर कोपहि रघुनायक। छुटिहहिं अति कराल बहु सायक।। तब कि चलिहि अस गाल तुम्हारा। अस बिचारि भजु राम उदारा।। सुनत बचन रावन परजरा। जरत महानल जनु घृत परा।। चौपाई (संदर्भ) यह चौपाई अंगद द्वारा रावण को दी गई अंतिम और कठोर चेतावनी है। यहाँ अंगद नीति, धर्म और भविष्य—तीनों के आधार पर रावण को समझाते हैं। 1️⃣ भावार्थ : अंगद कहते हैं— “हे रावण! अपनी झूठी चतुराई छोड़ दे और कृपासागर भगवान श्रीराम की शरण में जा। यदि तू श्रीराम का द्रोही बन गया, तो ब्रह्मा और रुद्र भी तुझे नहीं बचा सकते। मूर्ख! व्यर्थ की डींग मत हाँक, राम से बैर रखने का परिणाम अत्यंत भयानक होगा। तेरा सिर वानरों के सामने धरती पर गिरेगा और राम के बाण लगते ही वे सिर गेंद की तरह खेलेंगे। जब रणभूमि में रघुनाथ क्रोध करे...

लंका काण्ड दोहा (27)

 लंका काण्ड दोहा 27 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0-सेन सहित तब मान मथि बन उजारि पुर जारि।। कस रे सठ हनुमान कपि गयउ जो तव सुत मारि।।26।। भावार्थ : अंगद  रावण के अहंकार को ठेस पहुंचाते हुए कहते हैं:  — हनुमान जी अकेले  तुम्हारी सेना को मार डाला  तुम्हारे उपवन को उजाड़ दिया, पूरी लंका जला दी, और तुम्हारे वीर पुत्र अक्षयकुमार का वध कर दिया। हे मूर्ख रावण! वह हनुमान एक साधारण कपि था, जो तुम्हारे पुत्र को मारकर सुरक्षित चला गया? तुम्हारा मान-मर्दन करके चला गया, फिर भी तुम अपनी प्रशंसा कर रहे हो। 3️⃣ वक्ता और श्रोता की पुष्टि वक्ता → अंगद श्रोता → रावण यह रावण का कथन नहीं, बल्कि अंगद का व्यंग्यात्मक और बोधक कथन है। 4️⃣ अंगद का उद्देश्य अंगद का लक्ष्य रावण को अपमानित करना नहीं, बल्कि उसे सत्य का बोध कराना है— यदि एक दूत (हनुमान) इतना पराक्रमी है, तो स्वयं श्रीराम और उनकी वानर-सेना कितनी अपार शक्ति से युक्त होगी। यहाँ अंगद रावण के अहंकार को तोड़ना चाहते हैं। 5️⃣ रावण की मानसिक स्थिति रावण— अंगद रावण को “सठ ” कहकर अपमान करता है, परंतु वह वास्तविकता समझ नहीं पाता। यह ...

लंका काण्ड चौपाई (229-236)

 लंका काण्ड चौपाई 229-236 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: सुनि अंगद सकोप कह बानी। बोलु सँभारि अधम अभिमानी।। सहसबाहु भुज गहन अपारा। दहन अनल सम जासु कुठारा।। जासु परसु सागर खर धारा। बूड़े नृप अगनित बहु बारा।। तासु गर्ब जेहि देखत भागा। सो नर क्यों दससीस अभागा।। राम मनुज कस रे सठ बंगा। धन्वी कामु नदी पुनि गंगा।। पसु सुरधेनु कल्पतरु रूखा। अन्न दान अरु रस पीयूषा।। बैनतेय खग अहि सहसानन। चिंतामनि पुनि उपल दसानन।। सुनु मतिमंद लोक बैकुंठा। लाभ कि रघुपति भगति अकुंठा।। भावार्थ (संक्षेप में): अंगद क्रोधित होकर रावण से कहते हैं—हे नीच और घमंडी! संभलकर बोल। जिस परशुराम ने सहस्त्रबाहु को जिसके हजारों भुज थे उसकी भुजा काट डाली थी, जिनका फरसा अग्नि के समान प्रचंड था, जिनके भय से असंख्य राजा समुद्र में डूबे—उनका भी घमंड  भाग गया। ऐसे पराक्रमी के आगे तू दसशीश क्यों अभागा बना फिरता है? राम को साधारण मनुष्य कहना वैसा ही है जैसे धनुष को कामदेव कहना, नदी को गंगा कहना, पशु को कामधेनु समझना, वृक्ष को कल्पतरु मानना, अन्न को दान और रस को अमृत कहना—यानी सत्य का घोर अपमान। गरुड़ को साधारण पक्षी और मणि को पत...

लंका काण्ड दोहा (26)

 लंका काण्ड दोहा 26 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0-तेहि रावन कहँ लघु कहसि नर कर करसि बखान। रे कपि बर्बर खर्ब खल अब जाना तव ग्यान।।25।। भावार्थ रावण क्रोध में अंगद से कहता है— “तू मुझे तुच्छ समझकर किसी साधारण मनुष्य (राम) की बढ़ाई कर रहा है। अरे कपि! तू तो असभ्य, दुष्ट और नीच है। अब मैं तेरी बुद्धि और ज्ञान को समझ गया।” विस्तृत विवेचन यह दोहा रावण के अहंकार, अज्ञान और क्रोध को स्पष्ट करता है। राम को ‘नर’ कहना रावण भगवान राम को केवल मनुष्य मानकर उनकी महिमा को कम आंक रहा है। यही उसका अज्ञान (अविद्या) है, क्योंकि राम साधारण नर नहीं, साक्षात् परमात्मा हैं। अंगद के प्रति अपमान अंगद ने नीति, धर्म और सत्य के आधार पर रावण को समझाने का प्रयास किया था, परंतु रावण ने उसे “कपि, बर्बर, खल” कहकर अपमानित किया। इससे रावण की दुष्ट प्रवृत्ति और अहंकार प्रकट होता है। अहंकार का अंधापन रावण इतना अहंकारी हो चुका है कि सत्य उसे कटु लगता है। वह हितकारी वचन को भी अपमान समझता है। यही अहंकार आगे चलकर उसके विनाश का कारण बनता है। नीति-संदेश यह दोहा सिखाता है कि जो व्यक्ति अहंकार में डूबा होता है, वह सत्य क...

लंका काण्ड चौपाई (221-228)

 लंका काण्ड चौपाई 221-228। का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: सुनु सठ सोइ रावन बलसीला। हरगिरि जान जासु भुज लीला।। जान उमापति जासु सुराई। पूजेउँ जेहि सिर सुमन चढ़ाई।। सिर सरोज निज करन्हि उतारी। पूजेउँ अमित बार त्रिपुरारी।। भुज बिक्रम जानहिं दिगपाला। सठ अजहूँ जिन्ह कें उर साला।। जानहिं दिग्गज उर कठिनाई। जब जब भिरउँ जाइ बरिआई।। जिन्ह के दसन कराल न फूटे। उर लागत मूलक इव टूटे।। जासु चलत डोलति इमि धरनी। चढ़त मत्त गज जिमि लघु तरनी।। सोइ रावन जग बिदित प्रतापी। सुनेहि न श्रवन अलीक प्रलापी।। भावार्थ रावण अंगद के सामने अपने बल, पराक्रम और तपस्या का घमंड करता हुआ कहता है— “हे मूर्ख! सुन, वही रावण हूँ जो अत्यंत बलशाली है। मेरी भुजाओं की लीला से पर्वत तक हिल जाते हैं। मैं वही हूँ जिसे स्वयं उमापति शिव और देवता जानते हैं। मैंने अपने सिर कमल की भाँति काट-काटकर पुष्प की तरह चढ़ाकर शिव की असंख्य बार पूजा की है। मेरे भुजबल को दिशाओं के रक्षक देवता और दिग्गज जानते हैं। जब-जब मैं युद्ध करता हूँ, बड़े-बड़े वीर हार जाते हैं। जिनके भयानक दाँत भी नहीं टूटे, उनके हृदय मेरे प्रहार से जड़ की तरह टूट गए। मेरे चलने ...

लंका काण्ड दोहा (25)

 लंका काण्ड दोहा 25 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0-एक कहत मोहि सकुच अति रहा बालि की काँख। इन्ह महुँ रावन तैं कवन सत्य बदहि तजि माख।।24।। भावार्थ : अंगद कहते हैं—  एक बात कहते हुए मुझे संकोच होता है कि तूं वही रावण है, जिसे बालि ने अपने कांख में दबाकर रखा था। अब तुम्हीं बताओ कि तुम कौन-सा रावण हो? विवेचन : यहाँ अंगद बालि–रावण प्रसंग याद दिलाते हैं, जब बालि ने रावण को काँख में दबाकर अपमानित किया था। अंगद यह दिखाना चाहते हैं कि—जिस रावण की यह दशा हो चुकी, उसके सामने वानर-वीरों से डरने का कोई कारण नहीं। यह दोहा रावण के अहंकार को तोड़ने और उसकी पुरानी हार याद दिलाने के लिए कहा गया है।       रावण की सारी पुरानी पराजय को  याद दिलाकर अंगद उसके घमंड को तोड़ना चाहते हैं, ताकि वह सही मार्ग अपना लें।

लंका काण्ड चौपाई (205-220)

 लंका काण्ड चौपाई 205-220 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: धन्य कीस जो निज प्रभु काजा। जहँ तहँ नाचइ परिहरि लाजा।। नाचि कूदि करि लोग रिझाई। पति हित करइ धर्म निपुनाई।। अंगद स्वामिभक्त तव जाती। प्रभु गुन कस न कहसि एहि भाँती।। मैं गुन गाहक परम सुजाना। तव कटु रटनि करउँ नहिं काना।। कह कपि तव गुन गाहकताई। सत्य पवनसुत मोहि सुनाई।। बन बिधंसि सुत बधि पुर जारा। तदपि न तेहिं कछु कृत अपकारा।। सोइ बिचारि तव प्रकृति सुहाई। दसकंधर मैं कीन्हि ढिठाई।। देखेउँ आइ जो कछु कपि भाषा। तुम्हरें लाज न रोष न माखा।। जौं असि मति पितु खाए कीसा। कहि अस बचन हँसा दससीसा।। पितहि खाइ खातेउँ पुनि तोही। अबहीं समुझि परा कछु मोही।। बालि बिमल जस भाजन जानी। हतउँ न तोहि अधम अभिमानी।। कहु रावन रावन जग केते। मैं निज श्रवन सुने सुनु जेते।। बलिहि जितन एक गयउ पताला। राखेउ बाँधि सिसुन्ह हयसाला।। खेलहिं बालक मारहिं जाई। दया लागि बलि दीन्ह छोड़ाई।। एक बहोरि सहसभुज देखा। धाइ धरा जिमि जंतु बिसेषा।। कौतुक लागि भवन लै आवा। सो पुलस्ति मुनि जाइ छोड़ावा।। भावार्थ इन चौपाइयों में अंगद और रावण के बीच संवाद है। रावण अंगद को कहता है कि तुम्हारे ...

लंका काण्ड दोहा (24)

 लंका काण्ड दोहा 24 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0-सत्य नगरु कपि जारेउ बिनु प्रभु आयसु पाइ। फिरि न गयउ सुग्रीव पहिं तेहिं भय रहा लुकाइ।।23(क)।। सत्य कहहि दसकंठ सब मोहि न सुनि कछु कोह। कोउ न हमारें कटक अस तो सन लरत जो सोह।।23(ख)।। प्रीति बिरोध समान सन करिअ नीति असि आहि। जौं मृगपति बध मेड़ुकन्हि भल कि कहइ कोउ ताहि।।23(ग)।। जद्यपि लघुता राम कहुँ तोहि बधें बड़ दोष। तदपि कठिन दसकंठ सुनु छत्र जाति कर रोष।।23(घ)।। बक्र उक्ति धनु बचन सर हृदय दहेउ रिपु कीस। प्रतिउत्तर सड़सिन्ह मनहुँ काढ़त भट दससीस।।23(ङ)।। हँसि बोलेउ दसमौलि तब कपि कर बड़ गुन एक। जो प्रतिपालइ तासु हित करइ उपाय अनेक।।23(छ)।। दोहा 23(क) – भावार्थ अंगद रावण से व्यंग्य से कहता है: हे रावण! क्या सचमुच कपि (हनुमान) ने प्रभु राम की आज्ञा बिना पाए लंका जलाई, परंतु इस कारण से वह सुग्रीव के पास नहीं गया, कहीं जाकर छुप गया। विवेचन अंगद यहाँ रावण के आरोप को काटता है। वह स्पष्ट करता है कि हनुमान का कार्य भयजनित नहीं, अपितु राम-प्रताप से उत्पन्न पराक्रम है। 🔸 दोहा 23(ख) – भावार्थ हे दशानन! सब लोग सत्य ही कहते हैं, पर तुम क्रोध में सत्य न...

लंका काण्ड चौपाई (195-204)

 लंका काण्ड चौपाई 195-204 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: तुम्हरे कटक माझ सुनु अंगद। मो सन भिरिहि कवन जोधा बद।। तव प्रभु नारि बिरहँ बलहीना। अनुज तासु दुख दुखी मलीना।। तुम्ह सुग्रीव कूलद्रुम दोऊ। अनुज हमार भीरु अति सोऊ।। जामवंत मंत्री अति बूढ़ा। सो कि होइ अब समरारूढ़ा।। सिल्पि कर्म जानहिं नल नीला। है कपि एक महा बलसीला।। आवा प्रथम नगरु जेंहिं जारा। सुनत बचन कह बालिकुमारा।। सत्य बचन कहु निसिचर नाहा। साँचेहुँ कीस कीन्ह पुर दाहा।। रावन नगर अल्प कपि दहई। सुनि अस बचन सत्य को कहई।। जो अति सुभट सराहेहु रावन। सो सुग्रीव केर लघु धावन।। चलइ बहुत सो बीर न होई। पठवा खबरि लेन हम सोई।। भावार्थ: रावण अंगद से कहता है—“हे अंगद! मेरी बात ध्यान से सुन। मुझसे युद्ध करने वाला ऐसा कौन-सा योद्धा है? तुम्हारे स्वामी राम तो नारी-वियोग से दुर्बल हो गए हैं और उनके छोटे भाई लक्ष्मण भी शोक से मलिन हैं। तुम और सुग्रीव दोनों एक ही कुल के हो; मेरा छोटा भाई (विभीषण) भी अत्यंत कायर है। जामवंत जैसा मंत्री बहुत बूढ़ा है, वह अब युद्ध में कैसे चढ़ेगा? नल-नील तो केवल निर्माण-कला जानते हैं। एक ही कपि (हनुमान) है जो बड़ा बलवा...

लंका काण्ड दोहा (23)

 लंका काण्ड दोहा 23 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन करे : दो0-जनि जल्पसि जड़ जंतु कपि सठ बिलोकु मम बाहु। लोकपाल बल बिपुल ससि ग्रसन हेतु सब राहु।।22(क)।। पुनि नभ सर मम कर निकर कमलन्हि पर करि बास। सोभत भयउ मराल इव संभु सहित कैलास।।22(ख)।। दोहा 22(क) — भावार्थ रावण कहता है— “हे कपि! तू जड़, नीच और मूर्ख है, व्यर्थ बकवास मत कर। मेरे बाहुबल को देख। लोकपालों के समान मेरा बल अपार है। जैसे राहु चन्द्रमा को ग्रसने हेतु सदा तत्पर रहता है, वैसे ही मैं सबको दबाने में समर्थ हूँ।” विवेचन: यहाँ रावण का अहंकार, दर्प और आत्ममुग्धता प्रकट होती है। वह अपने बाहुबल की तुलना लोकपालों से करता है और स्वयं को राहु के समान सर्वग्रासी बताता है। राहु का चन्द्रग्रहण रूपक बताता है कि रावण धर्म, मर्यादा और उजास (चन्द्रमा) को निगलने का दंभ रखता है। पर तुलसीदास संकेत देते हैं—राहु का प्रभाव क्षणिक होता है; सत्य और धर्म फिर प्रकाशित होते हैं। यही रावण के पतन का सूचक है। 🔹 दोहा 22(ख) — भावार्थ रावण आगे कहता है— “मेरे बाण आकाश में ऐसे फैलते हैं कि वे शत्रु के हाथों (कमलों) पर जाकर टिक जाते हैं। तब मैं शिव सहित कैलास प...

लंका काण्ड चौपाई (187-194)

 लंका काण्ड चौपाई 187-194 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: सिव बिरंचि सुर मुनि समुदाई। चाहत जासु चरन सेवकाई।। तासु दूत होइ हम कुल बोरा। अइसिहुँ मति उर बिहर न तोरा।। सुनि कठोर बानी कपि केरी। कहत दसानन नयन तरेरी।। खल तव कठिन बचन सब सहऊँ। नीति धर्म मैं जानत अहऊँ।। कह कपि धर्मसीलता तोरी। हमहुँ सुनी कृत पर त्रिय चोरी।। देखी नयन दूत रखवारी। बूड़ि न मरहु धर्म ब्रतधारी।। कान नाक बिनु भगिनि निहारी। छमा कीन्हि तुम्ह धर्म बिचारी।। धर्मसीलता तव जग जागी। पावा दरसु हमहुँ बड़भागी।। भावार्थ : अंगद जी रावण से कहते हैं— जिस प्रभु श्रीराम के चरणों की सेवा शिव, ब्रह्मा, देवता और मुनिगण चाहते हैं, उसी प्रभु का दूत बनकर आना हमारे लिए गौरव की बात है, लज्जा की नहीं। ऐसी बुद्धि तुम्हारे हृदय में नहीं आती। अंगद की यह कठोर व निर्भीक वाणी सुनकर रावण क्रोध से आँखें तरेरता हुआ कहता है— “हे वानर! तुम्हारे कटु वचनों को मैं सह रहा हूँ, क्योंकि मैं नीति-धर्म जानता हूँ।” अंगद पर कटाक्ष करते हुए रावण कहता है— “तुम्हारी धर्मशीलता की चर्चा सुनी है, तुमने परायी स्त्री का अपहरण किया था।” अंगद प्रत्युत्तर देते हैं— “मैंने स्...

लंका काण्ड दोहा (22)

 लंका काण्ड दोहा 22 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0-हम कुल घालक सत्य तुम्ह कुल पालक दससीस। अंधउ बधिर न अस कहहिं नयन कान तव बीस।।21। भावार्थ : अंगद रावण से कहते हैं— “तुम्हारे लिए यह सत्य है कि हम अपने कुल का नाश करने वाले हैं और तुम अपने कुल का पालन-पोषण करने वाले हो। क्योंकि अंधे और बहरे भी ऐसा नहीं कह सकते और तुम्हारे तो बीस आँखें और बीस कान हैं; सब कुछ देखकर-सुनकर भी तुम सत्य नहीं समझ रहे हो।” विस्तृत विवेचन अंगद के पिता बाली की हत्या भगवान राम ने हीं की थी, इसलिए रावण ने व्यंग्य स्वरूप उसे कुलघाती कहा। परंतु अंगद ने रावण को भगवान राम की शरण में जाने को कहा। यह दोहा अंगद के निर्भीक, तर्कपूर्ण और व्यंग्यपूर्ण वचन को प्रकट करता है। अंगद रावण के अहंकार को तोड़ते हुए उसे आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करते हैं। 1. “हम कुल घालक, तुम कुल पालक” अंगद स्पष्ट स्वीकार करते हैं कि  वे अपने पिता के हत्यारे भगवान राम का साथ दिया दे रहे हैं जिन्होंने धर्म की रक्षा के लिए बाली की हत्या की, जबकि रावण स्वयं को अपने कुल का रक्षक मानता है। यह कथन सत्य पर आधारित है, किंतु इसमें यह संकेत भी है कि ...

लंका काण्ड चौपाई (177-186)

 लंका काण्ड चौपाई 177-186 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: रे कपिपोत बोलु संभारी। मूढ़ न जानेहि मोहि सुरारी।। कहु निज नाम जनक कर भाई। केहि नातें मानिऐ मिताई।। अंगद नाम बालि कर बेटा। तासों कबहुँ भई ही भेटा।। अंगद बचन सुनत सकुचाना। रहा बालि बानर मैं जाना।। अंगद तहीं बालि कर बालक। उपजेहु बंस अनल कुल घालक।। गर्भ न गयहु ब्यर्थ तुम्ह जायहु। निज मुख तापस दूत कहायहु।। अब कहु कुसल बालि कहँ अहई। बिहँसि बचन तब अंगद कहई।। दिन दस गएँ बालि पहिं जाई। बूझेहु कुसल सखा उर लाई।। राम बिरोध कुसल जसि होई। सो सब तोहि सुनाइहि सोई।। सुनु सठ भेद होइ मन ताकें। श्रीरघुबीर हृदय नहिं जाकें।। भावार्थ : रावण अंगद से कहता है— “अरे वानर! सँभलकर बोल। तू मुझे देवताओं का शत्रु नहीं जानता। अपना नाम बता और अपने पिता का नाम बता और किस कारण से तुम्हारे पिता के साथ मेरी मित्रता थी, यह भी बता। अंगद उत्तर देता है— “मेरा नाम अंगद है। मैं बालि का पुत्र हूँ। क्या कभी बालि से तुम्हारी भेंट हुई थी?” अंगद की बात सुनकर रावण सकुचाता है और कहता है— “हाँ, मैं बालि को जानता हूँ।” अंगद कहता है— “तुम बालि के पुत्र से बात कर रहे हो। तुम उसी...

लंका काण्ड दोहा (21)

 लंका काण्ड दोहा 21 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: प्रनतपाल रघुबंसमनि त्राहि त्राहि अब मोहि। आरत गिरा सुनत प्रभु अभय करैगो तोहि।। भावार्थ : हे रघुवंश के शिरोमणि श्रीराम! आप शरणागतों की रक्षा करने वाले हैं। अब मैं आपकी शरण में आया हूँ, मेरी रक्षा कीजिए। जब प्रभु श्रीराम किसी भी दुखी और शरणागत की करुण पुकार सुनते हैं, तो उसे तुरंत भयमुक्त कर देते हैं। विस्तृत विवेचन यह दोहा शरणागति के महान सिद्धांत को स्पष्ट करता है। यहाँ भयभीत होकर श्रीराम की शरण ली जा रही है। “त्राहि त्राहि” शब्द यह दर्शाता है कि शरण लेने वाला पूर्णतः असहाय हो चुका है और अब उसके पास प्रभु के अतिरिक्त कोई सहारा नहीं है। अंगद ने रावण को राम की शरण में जाने को कहा है  “प्रनतपाल” कहकर यह बताया गया है कि श्रीराम का स्वभाव ही शरणागत की रक्षा करना है। वे किसी की योग्यता नहीं देखते, केवल उसकी आर्त पुकार सुनते हैं। जैसे ही दुखी हृदय से पुकार उठती है, प्रभु करुणा से भर जाते हैं। इस दोहे में यह भी संदेश है कि प्रभु की शरण में आने के बाद भय का कोई स्थान नहीं रहता। श्रीराम स्वयं वचन देते हैं कि जो भी उनकी शरण में आएगा, उस...

लंका काण्ड चौपाई (169-176)

 लंका काण्ड चौपाई 169-176 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: चौपाई  कह दसकंठ कवन तैं बंदर। मैं रघुबीर दूत दसकंधर।। मम जनकहि तोहि रही मिताई। तव हित कारन आयउँ भाई।। उत्तम कुल पुलस्ति कर नाती। सिव बिरंचि पूजेहु बहु भाँती।। बर पायहु कीन्हेहु सब काजा। जीतेहु लोकपाल सब राजा।। नृप अभिमान मोह बस किंबा। हरि आनिहु सीता जगदंबा।। अब सुभ कहा सुनहु तुम्ह मोरा। सब अपराध छमिहि प्रभु तोरा।। दसन गहहु तृन कंठ कुठारी। परिजन सहित संग निज नारी।। सादर जनकसुता करि आगें। एहि बिधि चलहु सकल भय त्यागें।।  भावार्थ: रावण के पुछने पर कि तुम कौन हो,बंदर? अंगद रावण से कहते हैं— “हे दसकंठ! मैं कोई साधारण वानर नहीं, मैं रघुबीर श्रीराम का दूत हूँ। मेरे पिता (बालि) और तुम में मित्रता थी। मैं तुम्हारे हित के लिए ही यहाँ आया हूँ। तुम्हारा कुल अत्यंत श्रेष्ठ है—तुम पुलस्त्य ऋषि के वंशज हो, शिव और ब्रह्मा के उपासक हो, वरदान पाकर लोकपालों तक को जीत चुके हो। परंतु राजाओं के अभिमान और मोहवश तुमने भगवान की माया-शक्ति सीता जी का हरण कर लिया। अब मेरी शुभ बात सुनो—अपने अपराध स्वीकार करो, प्रभु राम से क्षमा माँगो, हाथ में ...

लंका काण्ड दोहा (20)

 लंका काण्ड दोहा 20 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0-जथा मत्त गज जूथ महुँ पंचानन चलि जाइ। राम प्रताप सुमिरि मन बैठ सभाँ सिरु नाइ।।19।। भावार्थ अंगद रावण के दरबार में इस तरह पहुंचता है जिस प्रकार मतवाले हाथियों के समूह में सिंह (पंचानन) के आ जाने से सब हाथी भयभीत होकर शांत हो जाते हैं, उसी प्रकार राम के प्रताप का स्मरण करते ही लंका की सभा में उपस्थित सभी राक्षस अहंकार छोड़कर सिर झुकाकर बैठ गए। विस्तृत विवेचन यह दोहा लंका की सभा के मनोभाव को प्रकट करता है। यहाँ तुलसीदास जी एक अत्यंत सशक्त उपमा देते हैं। मतवाले हाथी अहंकार, बल और उन्माद के प्रतीक हैं। सिंह (पंचानन) धर्म, साहस और सर्वोच्च शक्ति का प्रतीक है। जैसे ही सिंह हाथियों के समूह में प्रवेश करता है, वैसे ही राम के प्रताप का स्मरण मात्र राक्षसों के हृदय में भय और विवेक जगा देता है। यहाँ राम का प्रताप शारीरिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और नैतिक शक्ति के रूप में प्रकट होता है।उसी प्रकार अंगद के सभा में पहुंचने पर सभी राक्षस भयभीत और शांत हो कर बैठ गया। सभा में बैठे राक्षस बाहरी रूप से बलवान हैं, परंतु राम के नाम और यश का स्मरण होते ...

लंका काण्ड चौपाई (161-168)

लंका काण्ड चौपाई 161-168 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: चौपाई तुरत निसाचर एक पठावा। समाचार रावनहि जनावा।। सुनत बिहँसि बोला दससीसा। आनहु बोलि कहाँ कर कीसा।। आयसु पाइ दूत बहु धाए। कपिकुंजरहि बोलि लै आए।। अंगद दीख दसानन बैंसें। सहित प्रान कज्जलगिरि जैसें।। भुजा बिटप सिर सृंग समाना। रोमावली लता जनु नाना।। मुख नासिका नयन अरु काना। गिरि कंदरा खोह अनुमाना।। गयउ सभाँ मन नेकु न मुरा। बालितनय अतिबल बाँकुरा।। उठे सभासद कपि कहुँ देखी। रावन उर भा क्रौध बिसेषी।। भावार्थ जब अंगद लंका में पहुँचे, तब राक्षसों ने तुरंत एक दूत को रावण के पास भेजा। दूत ने रावण को समाचार दिया कि एक वानर दूत आया है। यह सुनकर रावण हँसते हुए बोला—“उस बंदर को पकड़कर यहाँ ले आओ।” आज्ञा पाकर बहुत से दूत दौड़े और उस महाबली वानर अंगद को सभा में ले आए। अंगद को देखकर रावण ऐसा लगा मानो प्राणों सहित काजल पर्वत सामने बैठा हो। उसकी भुजाएँ वृक्षों के समान, सिर पर्वत-शिखर जैसा, शरीर के रोम लताओं जैसे प्रतीत हो रहे थे। उसका मुख, नासिका, नेत्र और कान पर्वत की गुफाओं के समान भयंकर लग रहे थे। अंगद निर्भय होकर सभा में पहुँचा, उसके मन में तनिक...

लंका काण्ड दोहा (19)

 लंका काण्ड दोहा 19 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दोहा – 18 (लंका काण्ड) गयउ सभा दरबार तब सुमिरि राम पद कंज। सिंह ठवनि इत उत चितव धीर बीर बल पुंज।। भावार्थ : अंगद भगवान राम के चरण-कमलों को स्मरण करते हुए रावण की सभा में प्रवेश करता है। वह सिंह के समान दृढ़ और वीर भाव से इधर-उधर देखता है। उसका साहस, धैर्य और अपार शक्ति स्पष्ट दिखाई देती है। विस्तृत विवेचन 1. “गयउ सभा दरबार तब सुमिरि राम पद कंज।” अंगद जब रावण की सभा में प्रवेश करते हैं, तो वे पहले श्रीराम के चरणों का स्मरण करते हैं— यह भक्ति और कर्तव्यनिष्ठा का प्रतीक है। दूत होने के कारण उनके भीतर कोई अहंकार नहीं, बल्कि प्रभु पर पूर्ण श्रद्धा है। यह संदेश है कि संकट में सदैव ईश्वर का स्मरण साहस बढ़ाता है। अंगद जानते थे कि रावण के दरबार में जाना साधारण कार्य नहीं है, फिर भी श्रीराम की कृपा को स्मरण कर वे निर्भीक बने रहे। 2. “सिंह ठवनि इत उत चितव धीर बीर बल पुंज।” यह पंक्ति अंगद के व्यक्तित्व का अत्यंत प्रभावशाली चित्र खींचती है— अंगद का चाल-ढाल सिंह के समान था: गर्वीला, तेजस्वी और निर्भय। वे इधर-उधर देखते हैं, लेकिन डरकर नहीं, बल्क...

लंका काण्ड चौपाई (151-160)

 लंका काण्ड चौपाई 151-160 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: बंदि चरन उर धरि प्रभुताई। अंगद चलेउ सबहि सिरु नाई।। प्रभु प्रताप उर सहज असंका। रन बाँकुरा बालिसुत बंका।। पुर पैठत रावन कर बेटा। खेलत रहा सो होइ गै भैंटा।। बातहिं बात करष बढ़ि आई। जुगल अतुल बल पुनि तरुनाई।। तेहि अंगद कहुँ लात उठाई। गहि पद पटकेउ भूमि भवाँई।। निसिचर निकर देखि भट भारी। जहँ तहँ चले न सकहिं पुकारी।। एक एक सन मरमु न कहहीं। समुझि तासु बध चुप करि रहहीं।। भयउ कोलाहल नगर मझारी। आवा कपि लंका जेहीं जारी।। अब धौं कहा करिहि करतारा। अति सभीत सब करहिं बिचारा।। बिनु पूछें मगु देहिं दिखाई। जेहि बिलोक सोइ जाइ सुखाई।। भावार्थ : अंगद प्रभु राम के चरणों को हृदय में रखकर विनम्रता से निकल पड़े। उनकी स्वाभाविक वीरता और तेज देखकर राक्षस घबरा गए। रावण का बेटा जो पहले खेलता-कूदता घूम रहा था, बातों-बात में अंगद से भिड़ने लगा। उसने पैर उठाकर अंगद को मारना चाहा, पर अंगद ने उसका पैर पकड़कर उसे धरती पर पटक दिया—धरती हिल उठी। यह देखकर राक्षसों में भारी भय फैल गया। सब समझ गए कि उसे मार दिया गया है पर डर के कारण कह न सके। पूरा नगर कोलाहल से भर ग...

लंका काण्ड सोरठा (18)

 लंका काण्ड सोरठा 18 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन,: सो0-प्रभु अग्या धरि सीस चरन बंदि अंगद उठेउ। सोइ गुन सागर ईस राम कृपा जा पर करहु।।17(क)।। स्वयं सिद्ध सब काज नाथ मोहि आदरु दियउ। अस बिचारि जुबराज तन पुलकित हरषित हियउ।।17(ख)।। भावार्थ : भगवान राम की आज्ञा पाकर अंगद रावण के यहां दूत बनकर जाने को तैयार हुआ है और यह सोरठा उसी संदर्भ में है:- प्रभु (राम) की आज्ञा पाकर अंगद, जो सिर धरकर चरणों में नतमस्तक था, उठा। वह (अंगद) गुणों का सागर है — और यह सब राम की कृपा की वजह से है। खुद प्रभु ने सब काम सिद्ध किए और मुझे मान दिया; ये सोचकर जुबराज (राजपूत/उच्च अधिकारी/आत्मा) का तन उल्लासित हुआ और हृदय आनंद से भर गया। विस्तृत विवेचन 1. पंक्ति-वार वाक्य-वितरण और अर्थ “प्रभु अग्या धरि सीस चरन बंदि अंगद उठेउ।” प्रभु अग्या धरि = प्रभु की आज्ञा पाते ही / जब राम ने आदेश दिया। सीस चरन बंदि = सिर चरन पर बाँधना — यहाँ का भाव नतमस्तक होना/पूरी श्रद्धा से शीश जोड़कर चरण स्पर्श करना है (गहरे प्रणाम का चित्र)। अंगद उठेउ = उस प्रणाम के बाद अंगद उठे — अर्थात आज्ञा मिलते ही वह उठकर आगे बढ़ा या व्यवस्थित हुआ। संद...

लंका काण्ड चौपाई (143-150)

 लंका काण्ड चौपाई 143-150 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: इहाँ प्रात जागे रघुराई। पूछा मत सब सचिव बोलाई।। कहहु बेगि का करिअ उपाई। जामवंत कह पद सिरु नाई।। सुनु सर्बग्य सकल उर बासी। बुधि बल तेज धर्म गुन रासी।। मंत्र कहउँ निज मति अनुसारा। दूत पठाइअ बालिकुमारा।। नीक मंत्र सब के मन माना। अंगद सन कह कृपानिधाना।। बालितनय बुधि बल गुन धामा। लंका जाहु तात मम कामा।। बहुत बुझाइ तुम्हहि का कहऊँ। परम चतुर मैं जानत अहऊँ।। काजु हमार तासु हित होई। रिपु सन करेहु बतकही सोई।। भावार्थ : सुबह प्रभु श्रीराम उठकर मंत्रियों को बुलाते हैं और पूछते हैं—अब क्या उपाय किया जाए? जामवंत जी हाथ जोड़कर कहते हैं—हे सर्वज्ञ प्रभु! मेरी बुद्धि के अनुसार एक दूत (संदेशवाहक) भेजना उचित होगा। यह सलाह सबको पसंद आती है। तब श्रीरामजी अंगद को बुलाकर कहते हैं—हे बालि-पुत्र! तुम बुद्धि, बल और गुणों के भंडार हो, इसलिए मेरे कार्य की सिद्धि के लिए लंका जाओ। तुम्हें अधिक समझाने की जरूरत नहीं, मैं तुम्हें अत्यंत चतुर जानता हूँ। मेरे काम और रावण के हित दोनों इसी में है कि तुम उससे संदेश-वार्ता करो। विस्तृत विवेचन इहाँ प्रात जागे रघुर...

लंका काण्ड दोहा और सोरठा (17)

लंका काण्ड दोहा और सोरठा 17 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दोहा 16(क) दोहा: “एहि बिधि करत बिनोद बहु प्रात प्रगट दसकंध। सहज असंक लंकपति सभाँ गयउ मद अंध।।16(क)।।” भावार्थ इस प्रकार (मन्दोदरी द्वारा दी गई शिक्षाओं और अपशकुनों के संकेतों को) सुनकर भी रावण ने इसे हँसी और खेल की बात समझकर बहुत समय तक विनोद करता रहा। प्रातःकाल वह लंका का स्वामी रावण, जो स्वभाव से ही निर्भीक और अहंकार के मद में अंधा था, गर्व से भरा अपनी सभा में उपस्थित हुआ। विस्तृत विवेचन रावण के सामने लगातार अपशकुन और चेतावनियाँ आ रही थीं—मंदोदरी समझा रही थीं कि श्रीराम भगवान हैं और उनसे बैर न करो। परंतु अहंकार बुद्धि को अंधा बना देता है, इसलिए रावण ने किसी भी बात को गंभीरता से नहीं लिया। उसका स्वभाव था–साहस, अभिमान और अविवेक, इसलिए वह अनहोनी की आहट नहीं समझ सका। नशा, शक्ति, ऐश्वर्य और विजय की आदत उसे असावधान बना चुकी थी। यही कारण है कि वह प्रातःकाल सभा में आता है, मानो कोई बड़ी विजय प्राप्त करने जा रहा हो—जबकि विनाश उसके सिर पर खड़ा था। निष्कर्ष: जिस व्यक्ति में अहंकार भर जाता है, वह शुभ–अशुभ का विचार नहीं कर पाता और विनाश ...

लंका काण्ड चौपाई (134-142)

लंका काण्ड चौपाई 134-142 का भावार्थ सहित विस्तृत उ: बिहँसा नारि बचन सुनि काना। अहो मोह महिमा बलवाना।। नारि सुभाउ सत्य सब कहहीं। अवगुन आठ सदा उर रहहीं।। साहस अनृत चपलता माया। भय अबिबेक असौच अदाया।। रिपु कर रुप सकल तैं गावा। अति बिसाल भय मोहि सुनावा।। सो सब प्रिया सहज बस मोरें। समुझि परा प्रसाद अब तोरें।। जानिउँ प्रिया तोरि चतुराई। एहि बिधि कहहु मोरि प्रभुताई।। तव बतकही गूढ़ मृगलोचनि। समुझत सुखद सुनत भय मोचनि।। मंदोदरि मन महुँ अस ठयऊ। पियहि काल बस मतिभ्रम भयऊ।। भावार्थ : मंदोदरी के उपदेश सुनकर रावण हल्का-सा मुस्कुराया और बोला— देखो मोह का प्रभाव कितना प्रबल होता है, जब किसी को लगाव हो जाता है तो बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। सभी लोग कहते हैं कि स्त्रियों में आठ दोष स्वभावत: रहते हैं— साहस, झूठ, चंचलता, मायाचातुर्य, भय, विवेकहीनता, अशौच और दया का अभाव। रावण कहता है— तुमने मेरे शत्रु राम के स्वरूप का अत्यधिक वर्णन किया और भयावह परिणाम सुनाए। परंतु तुम मेरी प्रिय पत्नी हो, इसलिए तुम्हारी बातें मैंने ध्यान से सुनीं। मैं समझ गया कि तुम चतुराई से मुझे शिक्षा देना चाहती हो। तुमने बड़े रहस्यमय और मधु...

लंका काण्ड दोहा (16)

 लंका काण्ड दोहा 16 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0 – अहंकार सिव बुद्धि अज मन ससि चित्त महान। मनुज बास सचराचर रूप राम भगवान।। 15(क) ।। अस बिचारि सुनु प्रानपति प्रभु सन बयरु बिहाइ। प्रीति करहु रघुबीर पद मम अहिवात न जाइ।। 15(ख) ।। भावार्थ (संक्षेप में) हे प्राणनाथ! भगवान राम अहंकार के शत्रु हैं, और शिव, ब्रह्मा व चन्द्रमा से भी श्रेष्ठ बुद्धि, मन और चित्त रखने वाले हैं। वे चराचर जगत रूप से युक्त मानव रूप में भगवान हैं। ऐसे प्रभु से वैर मत रखिए, उनके चरणों में प्रेम कीजिए— यही मेरी शुभकामना है। विस्तृत विवेचन यह दोहा मंदोदरी द्वारा रावण को दिया गया उपदेश है। जब रावण श्रीराम के विरोध में अत्यधिक दुराग्रह दिखाता है, तब मंदोदरी उसे सत्य समझाने के लिए कहती है– (क) भाग का विश्लेषण "अहंकार सिव बुद्धि" – श्रीराम वह ईश्वर हैं जो अहंकार को नष्ट करने वाले हैं। जैसा शिव विषपान कर समस्त जगत की रक्षा करते हैं, वैसे ही राम दंभ और अहंकार का नाश करते हैं। "अज मन ससि चित्त महान" – ब्रह्मा (अज), मन, चन्द्रमा और चित्त— इन सबका योग भी जिस बुद्धि से जीत नहीं सकता वह राम में विद्यमान है...

लंका काण्ड चौपाई (126-133)

 लंका काण्ड चौपाई 126-133 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: पद पाताल सीस अज धामा। अपर लोक अँग अँग बिश्रामा।। भृकुटि बिलास भयंकर काला। नयन दिवाकर कच घन माला।। जासु घ्रान अस्विनीकुमारा। निसि अरु दिवस निमेष अपारा।। श्रवन दिसा दस बेद बखानी। मारुत स्वास निगम निज बानी।। अधर लोभ जम दसन कराला। माया हास बाहु दिगपाला।। आनन अनल अंबुपति जीहा। उतपति पालन प्रलय समीहा।। रोम राजि अष्टादस भारा। अस्थि सैल सरिता नस जारा।। उदर उदधि अधगो जातना। जगमय प्रभु का बहु कलपना।। भावार्थ श्रीराम का दिव्य स्वरूप अनंत और असीम है। उनके चरण पाताल तक विस्तृत हैं और सिर ब्रह्मलोक तक। उनके हर अंग में विभिन्न लोक विराजमान हैं। उनकी भृकुटि का कंपन प्रलयकाल जैसा भयावह है। उनकी आँखें सूर्य के समान तेजवान हैं और केश वर्षा के मेघों जैसे। उनकी घ्राण शक्ति अश्विनी कुमारों जैसी दिव्य है। उनके कान दसों दिशाओं में फैले हैं और वेदों का सार सुनते हैं। उनकी श्वास वायु देव जैसी प्रचंड है और वाणी वेदों की मूल ध्वनि। उनके दाँत यम के दाँतों जैसे भयंकर और माया हँसी से लोकपाल भयभीत हो जाते हैं। उनके मुख में अग्नि, जीभ पर जल, और संपूर्ण शरीर...

लंका काण्ड दोहा (15)

लंका काण्ड दोहा 15 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0-बिस्वरुप रघुबंस मनि करहु बचन बिस्वासु। लोक कल्पना बेद कर अंग अंग प्रति जासु।।14।। 1)भावार्थ : “मेरे इन वचनों पर भरोसा कीजिए — रघुबंश का मणि (श्रीराम) विश्वरूप हैं। लोक की कल्पना और वेद भी यही कहते हैं कि उनके प्रत्येक अंग-अंग में लोक (संसार) विद्यमान है।”  2) विस्तृत विवेचन : 1. शब्द-शब्द खुलासा बिस्वरुप = विश्वरूप (सम्पूर्ण ब्रह्मांड का रूप)। रघुबंस मनि = रघुकुल का मणि = श्रीराम, रघुवंश के शिर्ष-माणिक। मनि करहु बचन बिस्वासु = मेरे कहे पर विश्वास करो। लोक कल्पना बेद कर अंग-अंग प्रति जासु = लोकों की कल्पना और वेद भी कहें कि उनका हर अंग-अंग संसार का बोध कराता है / उसमें लोक समाए हुए हैं। (यह शब्दार्थ अलग-अलग व्याख्याओं में सामान्यत: यही समझा जाता है।)  2. काव्यिक और दार्शनिक स्तर ऊपर वाला स्तर (भक्ति/दैवत्व): यहाँ राम को न केवल मानव नायक बल्कि सार्वभौमिक देवत्व के रूप में प्रस्तुत किया गया — “विश्वरूप” की परंपरा का स्पष्ट इशारा। नीचे वाला स्तर (मानव/नैतिक): मन्दोदरी-प्रसंग में यह पंक्ति रावण को सचेत करने के लिये है — अतः यह ...

लंका काण्ड चौपाई (118-125)

 लंका काण्ड चौपाई 118-125 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: चौपाई — कंप न भूमि न मरुत बिसेषा। अस्त्र सस्त्र कछु नयन न देखा।। सोचहिं सब निज हृदय मझारी। असगुन भयउ भयंकर भारी।। दसमुख देखि सभा भय पाई। बिहसि बचन कह जुगुति बनाई।। सिरउ गिरे संतत सुभ जाही। मुकुट परे कस असगुन ताही।। सयन करहु निज निज गृह जाई। गवने भवन सकल सिर नाई।। मंदोदरी सोच उर बसेऊ। जब ते श्रवनपूर महि खसेऊ।। सजल नयन कह जुग कर जोरी। सुनहु प्रानपति बिनती मोरी।। कंत राम बिरोध परिहरहू। जानि मनुज जनि हठ मन धरहू।। भावार्थ : भगवान राम के बाण जब रावण का छत्रक, मुकुट और ताटंक को गिराकर वापस तरकश में लौट आया,यह किसी को भी दिखाई  नहीं दिया। लंकापुरी में अचानक भयानक अशुभ संकेत प्रकट हुए। न धरती काँप रही थी, न वायु का कोई विक्षोभ था, न ही अस्त्र–शस्त्र दिखाई दे रहे थे; परन्तु सबके मन में एक अज्ञात भय भर गया—भारी अशुभ का संकेत। ये एक दिव्य अदृश्य संकेत था कि कोई बड़ी अनिष्ट घटना होने वाली है। सभा में उपस्थित राक्षस डरे हुए थे। रावण ने उन सबको भयभीत देखकर हँसते हुए दिखावटी धैर्य और छलपूर्ण बुद्धि से कहा—“राजाओं के मुकुट गिरना सदैव शु...

लंका काण्ड दोहा (14)

 लंका काण्ड दोहा 14 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0-छत्र मुकुट ताटंक तब हते एकहीं बान। सबकें देखत महि परे मरमु न कोऊ जान।।13(क)।। अस कौतुक करि राम सर प्रबिसेउ आइ निषंग। रावन सभा ससंक सब देखि महा रसभंग।।13(ख)।। दोहा दो0-छत्र मुकुट ताटंक तब हते एकहीं बान। सबकें देखत महि परे मरमु न कोऊ जान।।13(क)।। भावार्थ : प्रभु श्रीराम ने एक ही बाण से रावण के छत्र, मुकुट और ताटंक (कान के कुंडल) एक साथ काट गिराए। यह अद्भुत कौतुक सब देखकर सब लोग आश्चर्यचकित रह गए। वे वस्तुएँ पृथ्वी पर गिर पड़ीं, परंतु किसी को समझ में न आया कि यह चमत्कार कैसे हुआ। अस कौतुक करि राम सर प्रबिसेउ आइ निषंग। रावन सभा ससंक सब देखि महा रसभंग।।13(ख)।। भावार्थ : यह अद्भुत चमत्कार करके श्रीराम का बाण पुनः अपने तरकश में लौट आया। रावण की पूरी सभा भय से काँप उठी और सभा का सारा उत्साह नष्ट हो गया; क्योंकि सब समझ गए कि राम कोई साधारण मनुष्य नहीं, वे परम दिव्य शक्ति संपन्न भगवान हैं। विस्तृत विवेचन यह प्रसंग लंका काण्ड में युद्ध के मध्य आता है, जब रावण अपनी शक्ति के मद में चूर होकर युद्धभूमि में खड़ा है। वह अपनी वीरता का घमंड करता...

लंका काण्ड चौपाई (110-117)

 लंका काण्ड चौपाई 110-117 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: चौपाई: देखु बिभीषन दच्छिन आसा। घन घंमड दामिनि बिलासा।। मधुर मधुर गरजइ घन घोरा। होइ बृष्टि जनि उपल कठोरा।। कहत बिभीषन सुनहु कृपाला। होइ न तड़ित न बारिद माला।। लंका सिखर उपर आगारा। तहँ दसकंघर देख अखारा।। छत्र मेघडंबर सिर धारी। सोइ जनु जलद घटा अति कारी।। मंदोदरी श्रवन ताटंका। सोइ प्रभु जनु दामिनी दमंका।। बाजहिं ताल मृदंग अनूपा। सोइ रव मधुर सुनहु सुरभूपा।। प्रभु मुसुकान समुझि अभिमाना। चाप चढ़ाइ बान संधाना।। भावार्थ :  भगवान राम विभीषण  से कहते हैं— दक्षिण दिशा की ओर देखिए। बादलों का समूह घनघोर गरज रहा है, बिजली चमक रही है, जैसे तेज वर्षा होने को तैयार हो।  तब विभीषण भगवान राम से कहते हैं कि यह वास्तविक बादल नहीं है, न ही यह बिजली है। यह रावण का विशाल महल है जो लंका के शिखर पर है और उसकी सैनिक सेना का अखाड़ा है। रावण के सर पर मेघों के समान अति विशाल काला छत्र है, जो घनघोर बादलों की छाया जैसा प्रतीत होता है। मंदोदरी के कानों में झूलते ताटंक (बड़े कर्णफूल) बिजली की चमक जैसे दिखाई पड़ते हैं। सेना में बाजे, नगाड़े, ताल-म...